12/08/2026
॥ शब्द-१३१ ॥
राम जिउ जग प्रपंच अधिकारा।।
जस दुनियां तस भेष भयो है बहुत भयो अहंकारा।।१।।
बहुत कुमारग सुमति नही है बहुत करै अपकारा।।
निन्दा करहि भाव नहि मानहि बहु तक काम बिगारा।।२।।
हंहि बिरूले जिन्ह पर कृपा करि दीन्ह लीन्ह त्योहारा।।
सुमति सुमारग पंथ चलत है तुम निरबाह निहारा।।३।।
सदा चरण की शरणहि राखी कबहूँ रहौ न न्यारा।।
जगजीवन दास तुम्हार कहावत चाहत दरश तुम्हारा।।४।।
भावार्थ:
परमात्मा से प्रार्थना करते हुए संत कहते हैं कि हे श्री राम जी! इस जगत में मायावी प्रपंचों का बहुत बड़ा अधिकार फैला हुआ है। लोग जैसा संसार का रंग-ढंग है, वैसा ही दिखावटी भेष धारण कर लेते हैं और उनके भीतर भारी अहंकार भर गया है। लोग कुमार्ग पर चल रहे हैं, उनमें शुभ बुद्धि (सुमति) नहीं है और वे एक-दूसरे का अहित (अपकार) करने में लगे हैं। वे संतों और भक्ति की निंदा करते हैं, प्रेम-भाव को नहीं मानते और इस तरह अपना ही काम बिगाड़ रहे हैं।
परंतु ऐसे जीव बहुत विरले ही हैं जिन पर आपने कृपा करके अपना लिया है और उन्हें भक्ति का सहारा (त्योहारा) दिया है। वे ही श्रेष्ठ बुद्धि पाकर सतमार्ग पर चल रहे हैं और आप ही उनके जीवन का निर्वाह करने वाले हैं। हे प्रभु! मुझे सदा अपने चरणों की शरण में रखिए, मैं कभी आपसे अलग (न्यारा) न होऊं। संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि हे प्रभु! मैं तो केवल आपका ही कहलाता हूँ और सदा आपके साक्षात दर्शन की अभिलाषा रखता हूँ। Satyanam saheb bandegi 🌸🙏🌸🎊🌼🎊🌼🎊🌼🎊🎊