Pooja singh Archana

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॥ शब्द-१३१ ॥​राम जिउ जग प्रपंच अधिकारा।।जस दुनियां तस भेष भयो है बहुत भयो अहंकारा।।१।।बहुत कुमारग सुमति नही है बहुत करै ...
12/08/2026

॥ शब्द-१३१ ॥
​राम जिउ जग प्रपंच अधिकारा।।
जस दुनियां तस भेष भयो है बहुत भयो अहंकारा।।१।।
बहुत कुमारग सुमति नही है बहुत करै अपकारा।।
निन्दा करहि भाव नहि मानहि बहु तक काम बिगारा।।२।।
हंहि बिरूले जिन्ह पर कृपा करि दीन्ह लीन्ह त्योहारा।।
सुमति सुमारग पंथ चलत है तुम निरबाह निहारा।।३।।
सदा चरण की शरणहि राखी कबहूँ रहौ न न्यारा।।
जगजीवन दास तुम्हार कहावत चाहत दरश तुम्हारा।।४।।
​भावार्थ:
परमात्मा से प्रार्थना करते हुए संत कहते हैं कि हे श्री राम जी! इस जगत में मायावी प्रपंचों का बहुत बड़ा अधिकार फैला हुआ है। लोग जैसा संसार का रंग-ढंग है, वैसा ही दिखावटी भेष धारण कर लेते हैं और उनके भीतर भारी अहंकार भर गया है। लोग कुमार्ग पर चल रहे हैं, उनमें शुभ बुद्धि (सुमति) नहीं है और वे एक-दूसरे का अहित (अपकार) करने में लगे हैं। वे संतों और भक्ति की निंदा करते हैं, प्रेम-भाव को नहीं मानते और इस तरह अपना ही काम बिगाड़ रहे हैं।
​परंतु ऐसे जीव बहुत विरले ही हैं जिन पर आपने कृपा करके अपना लिया है और उन्हें भक्ति का सहारा (त्योहारा) दिया है। वे ही श्रेष्ठ बुद्धि पाकर सतमार्ग पर चल रहे हैं और आप ही उनके जीवन का निर्वाह करने वाले हैं। हे प्रभु! मुझे सदा अपने चरणों की शरण में रखिए, मैं कभी आपसे अलग (न्यारा) न होऊं। संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि हे प्रभु! मैं तो केवल आपका ही कहलाता हूँ और सदा आपके साक्षात दर्शन की अभिलाषा रखता हूँ। Satyanam saheb bandegi 🌸🙏🌸🎊🌼🎊🌼🎊🌼🎊🎊

॥ शब्द-१३० ॥​साधो कहै तो कहा न जाइ।।आपनि घर मत कोउ न बूझै हमहि कहै समुझाइ।।१।।पण्डित जोगी दंडी तपसी बहु विवाद करै धाइ।।न...
12/08/2026

॥ शब्द-१३० ॥
​साधो कहै तो कहा न जाइ।।
आपनि घर मत कोउ न बूझै हमहि कहै समुझाइ।।१।।
पण्डित जोगी दंडी तपसी बहु विवाद करै धाइ।।
नाहिन नाम की ओर गही तिन्ह तिरथ व्रत ली लाई।।२।।
नाहिन काहू जीत कहाँ लहि कहूँ लहि कहै समुझाइ।।
करै जाइ तस जेहि जस भावै भुगतै तैसे जाइ।।३।।
बिरूला कोइ भजन करत है चाल चलै दिन ताइ।।
जगजीवन दास सतगुरू की मूरति चरण रहे लपटाइ।।४।।
​भावार्थ:
संत साधुओं को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे साधु भाई! इस संसार की दशा देखकर कुछ कहते नहीं बनता। लोग अपने निज घर (आंतरिक आत्म-स्वरूप) के भेद को तो नहीं समझते, लेकिन दूसरों को उपदेश देने और समझाने आ जाते हैं। पंडित, योगी, संन्यासी (दंडी) और तपस्वी बड़े-बड़े विवादों और शास्त्रार्थों में दौड़-दौड़कर उलझे रहते हैं। उन्होंने परमात्मा के सच्चे 'नाम' का आश्रय नहीं पकड़ा, बल्कि केवल बाह्य तीर्थ और व्रतों के आडंबर में ही मन को लगा रखा है।
​ऐसे विवादों में किसी की जीत नहीं होती, फिर भी न जाने वे क्या समझकर दूसरों को समझाने का दावा करते हैं। इस दुनिया में जिसे जैसा ठीक लगता है वह वैसा कर्म करता है, और अंततः जैसा कर्म करता है वैसा ही फल भोगता है। संत कहते हैं कि कोई विरला ही ऐसा साधक होता है जो अहंकार छोड़कर नम्रतापूर्वक सच्चा भजन करता है। संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि सच्चा साधक वही है जो सब प्रपंचों से दूर रहकर अपने सतगुरु की मूरति और चरणों से सदा लिपटा (लीन) रहता है। Satyanam saheb bandegi 🌹🎉🌹🙏🌹🎉🌼🎊🎊🌼🎊🌼🎊🌼🎊🌼

॥ शब्द-१२९ ॥​जग की रीति कहि न जाइ।।मिलहि भाव करि के अधीन हवै पाछे करि कुटिलाइ।।माला कण्ठी पहिरि सुमिरिनी दीन्हो तिलक बना...
12/08/2026

॥ शब्द-१२९ ॥
​जग की रीति कहि न जाइ।।
मिलहि भाव करि के अधीन हवै पाछे करि कुटिलाइ।।
माला कण्ठी पहिरि सुमिरिनी दीन्हो तिलक बनाइ।।१।।
करहि विवाद बहुत हठ करके परहि भ्रम मां जाइ।।
कहहि की भक्ति सिद्धि है निपटन्हि बहु बकबाद बढ़ाइ।।२।।
अन्तर राम भजन तहँ नाही जहाँ तहँ पूजा लाइ।।
अंतर राम भजन सुमिरहु प्रगट न देहु जनाइ।।३।।
जगजीवन दास गुप्त मत सुमिरहु प्रगट न देहु जनाइ।।
​भावार्थ:
दिखावटी भक्ति पर प्रहार करते हुए संत कहते हैं कि इस संसार की उलटी रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। लोग मुँह पर तो बड़ी नम्रता और भाव से मिलते हैं, परंतु पीछे छल-कपट और कुटिलता करते हैं। गले में कंठी-माला पहन लेते हैं, हाथ में सुमिरिनी (माला) ले लेते हैं और माथे पर तिलक लगा लेते हैं, परंतु उनका मन कपट से भरा रहता है। वे हठ करके व्यर्थ के शास्त्रार्थ और विवादों में उलझते हैं और स्वयं भ्रम के जाल में पड़े रहते हैं। वे बातों ही बातों में बड़ी-बड़ी डींगें हाँककर (बकबाद बढ़ाकर) स्वयं को सिद्ध और पहुँचे हुए भक्त घोषित करते हैं।
​परंतु ऐसे दिखावे के स्थानों पर हृदय का सच्चा 'राम-भजन' नहीं होता; वहाँ तो केवल बाहर की पूजा-सामग्री और आडंबर ही फैला रहता है। सच्ची साधना तो अंतर में प्रभु का सुमिरन करना है। संत जगजीवन दास जी उपदेश देते हैं कि इस गुप्त साधना मार्ग पर चलते हुए अपने आंतरिक भजन को बाहर किसी के सामने प्रकट मत होने दो, बल्कि अत्यंत सादगी और गुप्त रूप से उस परमात्मा का सुमिरन करो।Satyanam saheb bandegi 🌹🙏🌹🌼🌸🌼🎊🌼🎊🌼🌼🌸🌼🎊🌼🎊

॥ शब्द-१२९ ॥​जग की रीति कहि न जाइ।।मिलहि भाव करि के अधीन हवै पाछे करि कुटिलाइ।।माला कण्ठी पहिरि सुमिरिनी दीन्हो तिलक बना...
11/08/2026

॥ शब्द-१२९ ॥
​जग की रीति कहि न जाइ।।
मिलहि भाव करि के अधीन हवै पाछे करि कुटिलाइ।।
माला कण्ठी पहिरि सुमिरिनी दीन्हो तिलक बनाइ।।१।।
करहि विवाद बहुत हठ करके परहि भ्रम मां जाइ।।
कहहि की भक्ति सिद्धि है निपटन्हि बहु बकबाद बढ़ाइ।।२।।
अन्तर राम भजन तहँ नाही जहाँ तहँ पूजा लाइ।।
अंतर राम भजन सुमिरहु प्रगट न देहु जनाइ।।३।।
जगजीवन दास गुप्त मत सुमिरहु प्रगट न देहु जनाइ।।
​भावार्थ:
दिखावटी भक्ति पर प्रहार करते हुए संत कहते हैं कि इस संसार की उलटी रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। लोग मुँह पर तो बड़ी नम्रता और भाव से मिलते हैं, परंतु पीछे छल-कपट और कुटिलता करते हैं। गले में कंठी-माला पहन लेते हैं, हाथ में सुमिरिनी (माला) ले लेते हैं और माथे पर तिलक लगा लेते हैं, परंतु उनका मन कपट से भरा रहता है। वे हठ करके व्यर्थ के शास्त्रार्थ और विवादों में उलझते हैं और स्वयं भ्रम के जाल में पड़े रहते हैं। वे बातों ही बातों में बड़ी-बड़ी डींगें हाँककर (बकबाद बढ़ाकर) स्वयं को सिद्ध और पहुँचे हुए भक्त घोषित करते हैं।
​परंतु ऐसे दिखावे के स्थानों पर हृदय का सच्चा 'राम-भजन' नहीं होता; वहाँ तो केवल बाहर की पूजा-सामग्री और आडंबर ही फैला रहता है। सच्ची साधना तो अंतर में प्रभु का सुमिरन करना है। संत जगजीवन दास जी उपदेश देते हैं कि इस गुप्त साधना मार्ग पर चलते हुए अपने आंतरिक भजन को बाहर किसी के सामने प्रकट मत होने दो, बल्कि अत्यंत सादगी और गुप्त रूप से उस परमात्मा का सुमिरन करो। Satyanam saheb bandegi 🌺🙏🌺

11/08/2026

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