17/04/2025
क्या कहूं इस बदलते दौर पर
परिंदे घर छोड़ रहे हैं अब
उम्र के नाज़ुक मोड़ पर ...
पढ़ने के लिए
जीवन में कुछ करने के लिए
निकल पड़ते हैं अपनी दौड़ पर...
जी कटता है
मन विचलित हो जाता है
जाते हैं जब वो,घोंसला छोड़ कर...
खैर,समय का यही तकाज़ा है
आशीष यही,सफल होवे वो
संघर्ष की हर बाधा तोड़कर...🍂
..........खुशबू केजरीवाल 🌿