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22/01/2023
* #स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर सत् सत् नमन*🙏*स्वामी विवेकानंद और उनके परममित्र खेतड़ी के राजा अजीतसिंह*…  *आज से 125 ...
12/01/2023

* #स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर सत् सत् नमन*🙏

*स्वामी विवेकानंद और उनके परममित्र खेतड़ी के राजा अजीतसिंह*…

*आज से 125 साल पहले #स्वामी_विवेकानंद जी ने शिकांगों ने एक #ऐतिहासिक_भाषण दिया था। जिसकी चर्चा आज भी होती है.पर आपने ये सोचा कि आज से 125 साल पहले स्वामी जी कैसे और क्यूं गये होंगे शिकांगों ? किसने ये पूरी व्यबस्था की होगी कि एक महान आत्मा दूसरे देश जाए और भारत का प्रतिनिधित्व करें..... वो थे एक मात्र खेतड़ी के शेखावत क्षत्रिय राजा अजितसिंह जो स्वामी जी के मित्र भी थे और प्रसंशक भी* .......

*ब्रिटिश हुकूमत के दौर में जब भारत पर अंग्रेजों का अधिकार बढ़ रहा था। तब सबसे पहले विश्व-मंच पर भारत की आवाज बुलंद करने का श्रेय अगर किसी को दिया जा सकता है, तो वे शख्स स्वामी विवेकानंद हैं।*

*जब यूरोप और अमेरिका में भारत की छवि एक ऐसे देश की थी जहां माताएं अपने बच्चों को मगरमच्छों के सामने डाल देती हैं और हर गली में हाथी व सांप घूमते हैं, तब स्वामीजी ने उन्हें बताया कि वास्तव में भारत क्या है? उनके मुख से प्राचीन ग्रंथों की नई व्याख्या सुनकर सभी चकित रह गए।*

*कल तक जो लोग स्वामीजी के पहनावे को देखकर उनका मजाक उड़ा रहे थे, आज वे उनका व्याख्यान सुनकर नतमस्तक थे। तब अमेरिका का कोई अखबार ऐसा नहीं था जिसके प्रथम पृष्ठ पर स्वामीजी की तस्वीर और उनका परिचय प्रकाशित न हुआ हो।*

*अक्सर लोग स्वामीजी के नाम और उनके काम से तो परिचित हैं, लेकिन एक ऐसी शख्सियत भी है जिसके बारे में वे बहुत कम जानते हैं।*

*स्वामीजी के बारे में बहुत कुछ लिखा मिलता है परन्तु उस महान शख्सियत खेतड़ी के राजा अजीत सिंह के बारे में कांगियों और वामियों नें दुष्प्रचार ही किया ऐसे भारत माता के महान सपूत इस राजा का जीवन चरित्र भी बहुत महान रहा है स्वामीजी ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि राजा अजीत सिंह उनके सबसे प्रिय मित्र और शिष्य हैं। स्वामीजी की सफलता में राजा अजीत सिंह का महान योगदान रहा है।*

*यह उस समय की बात है जब भारत पर अंग्रेजी शासन का मजबूत शिकंजा कसा था। जब देशभक्ति की बात करने का मतलब गले में फांसी का फंदा होना था, तब अजीत सिंह स्वामीजी के संपर्क में आए और देशभक्ति की लौ हमेशा उज्ज्वल रखी।*

*ऐसे थे राजा अजीत सिंह
राजा अजीत सिंह का जन्म 16 अक्टूबर1861को राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित अलसीसर नामक ठिकाने के छूटभाई परिवार में हुआ था *अगर काल गणना को आधार माना जाए तो वे स्वामीजी से उम्र में करीब दो साल ही बड़े थे।*

*उनके पिता का नाम ठाकुर छत्तरसिंह था। जब खेतड़ी के तत्कालीन राजा फतेह सिंह का नाऔलाद देहांत हुआ तो अजीत सिंह को 1870 में उनकी इच्छानुसार गौद लिया और वो खेतड़ी के राजा बने*

*साल 1876 में उनका विवाह पोकरण ठिकाने की कुंवरी एजनकँवर चंपावतजी साहिबा के साथ हुआ जिनसे एक बेटा और दो बेटियां हुई!*
*स्वामीजी अपने जीवन में तीन बार खेतड़ी आए। पहले 1891 में, फिर विश्वधर्म सम्मेलन में जाने से पहले 1893 में और आखिरी बार 1897 में।*

*जब स्वामीजी ने अपने व्याख्यान से अमेरिका में विजय परचम फहराया तो सबसे ज्यादा प्रसन्नता राजा अजीत सिंह को हुई। इस खुशी में खेतड़ी में घी के दीपक जलाए गए और दीपावली की तरह पर्व की तरह मनाया गया!*

*इतने दानवीर थे राजा अजीत सिंह.....*
*स्वामीजी महान सिद्ध पुरुष थे। उनका ज्ञान, उच्च चरित्र और निष्कलंक जीवन देखकर ही राजा अजीत सिंह उनके शिष्य बने थे। जब स्वामीजी विश्वधर्म सम्मेलन में भाग लेने अमेरिका जा रहे थे उनका सम्पूर्ण खर्च तथा ये भी बहुत कम लोग जानते होंगे कि स्वामीजी के पिता का देहांत होने के बाद उनके परिवार को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था। ऐसे में अजीत सिंह ही थे जो उनके परिवार की हमेशा मदद करते रहे है !*

*इस राजा का आज भी है बहुत सम्मान है राजा अजीत सिंह हर माह उनके परिवार को रुपए भेजा करते थे, लेकिन उन्होंने कभी इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाया और न कभी किसी से इसका जिक्र किया।*
*खेतड़ी के लोग अपने इस *राजा का नाम आदर से लेते हैं। स्वामीजी जब खेतड़ी आए थे*

*कैसे नरेंद्र बना विवेकानंद*
*संन्यास से पूर्व स्वामी जी का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था।*

*उनके गुरु के स्वर्गवास के बाद वे संन्यासी बने और एक साधारण संन्यासी की तरह पूरे भारत का भ्रमण करने निकल पड़े। वे अपना परिचय विविदिषानंद नाम से भी देते थे। जब वे खेतड़ी के राजा से मिले तो उन्होंने ही स्वामीजी को विवेकानंद नाम दिया था। अजीत सिंह के अनुसार यही नाम उनके लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त था।*

*स्वामीजी को भी यह नाम पसंद आया और बाद में यही उनकी विश्व-व्यापी पहचान बन गया। राजा अजीत सिंह ने ही स्वामीजी को साफा बांधना सिखाया था और इसे हम उनकी कई तस्वीरों में भी देख सकते हैं।*

*जब स्वामीजी के अमेरिका जाने की चर्चा थी तो राजा अजीत सिंह ने फैसला किया कि वे भी भारत माता के इस महान सपूत की सहायता में भागीदार बनेंगे। उन्होंने अपने सचिव मुंशी जगमोहन लाल को मद्रास रवाना किया और स्वामीजी को सादर खेतड़ी बुलाया। उनके लिए राशि की व्यवस्था की और मुंशी जगमोहन लाल उन्हें बंबई तक छोडऩे आए। यहां से स्वामीजी जहाज से अमेरिका रवाना हुए।*

*गुरु-शिष्य में यह भी है एक समानता*
*लेकिन राजा अजीत सिंह की आयु अधिक नहीं रही। 18 जनवरी 1901 को उत्तरप्रदेश के सिकंदरा में उनका देहांत हो गया। यानी स्वामीजी के जन्मदिवस (12 जनवरी) से ठीक छह दिन बाद।*

*इसके अलावा दोनों में एक और समानता है। अपने शिष्य की मृत्यु से स्वामीजी को भी बहुत दुख हुआ और अगले ही साल वे भी (4 जुलाई 1902) ब्रह्मलीन हो गए। स्वामी जी ने स्वीकार किया है कि उनकी सफलता में राजा अजीत सिंह का अत्यधिक योगदान था। जब भी स्वामीजी की कीर्ति और यश का जिक्र किया जाएगा, राजा अजीत सिंह का नाम अवश्य आएगा*

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