09/06/2026
डेरा बाबा जोगीपंगा ऊना हिमाचल प्रदेश शांत, सुंदर, धार्मिक_आध्यात्मिक स्थान
बाबा जोगी पंगा मंदिर हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित एक बेहद शांत, पवित्र और आध्यात्मिक स्थान है। घने जंगलों के बीच बसा यह आश्रम अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह मंदिर स्थानीय संस्कृति और आस्था का एक प्रमुख केंद्र है।
जोगी पंगा' नामकरण कैसे हुआ?
कहा जाता है कि 'जोगी' (योगियों/संतों) द्वारा इस स्थान पर अपना 'पंगा' (अर्थात पनाह या आश्रय स्थल) बनाया गया था।
यह स्थल जिला ऊना से लगभग 12 कि० मी० की दूरी पर स्थित है। मुख्य सड़क से मंदिर की दूरी मात्र दो किलोमीटर है। यहाँ स्थित बौल नामक ग्राम को बाबा आत्मा नंद ने अपनी तपस्थली के रूप में चुना था। बाबा ने यहाँ अखण्ड धूना रमा कर निरंतर कई वर्षों तक घोर तप किया। बाबा जी की आलौकिक शक्तियों के फलस्वरूप गाँव में अनेक चमत्कारी घटनाएं घटने लगी। श्रद्धालु बाबा के दर्शन एवं प्रवचन हेतु इस स्थान पर एकत्रित होने लगे। तत्त्पश्चात् बाबा की तपस्थली आश्रम में परिवर्तित हो गई। बाबा ने श्रद्धालुओं के कल्याण हेतु एक चट्टान पर अपना चिमटा गाड़ दिया और वहाँ से जलधारा प्रवाहित होने लगी। तदोपरान्त श्रद्धालुओं द्वारा यहाँ एक बावड़ी का निर्माण किया गया। इस बावड़ी को 'चरण-गंगा' के नाम से पुकारा जाता है। श्रद्धालु 'चरण-गंगा' के जल को अपने घर में रखना अत्यंत कल्याणकारी समझते हैं। लोकविश्वास है कि यहाँ तालाब के जल से स्नान करने पर प्रत्येक प्रकार के मानसिक एवं शारीरिक रोग निर्मूल नष्ट हो जाते हैं। भूत-प्रेत, पिशाच, डाकनी आदि की छाया से ग्रसित लोगों को भी इसके जल से स्नान करने के पश्चात् प्रेत आत्माओं से मुक्ति मिलती है। आश्रम के समीप विशाल कड़ाहे (तालाब) हैं। जिनकी अथाह गहराई है। जनश्रुतियों के अनुसार गाँव के एक तरखान (बढ़ई) ने यहाँ स्थित तालाब की गहराई नापने का प्रयास किया था।
उसने रस्सी के आगे लोहे का तेस्सा नामक औजार बाँधा और रस्सी को तालाब में छोड़ दिया। वह उस समय आश्चर्यचकित हो गया, जब उसने देखा कि एक ओर जहाँ उसकी रस्सी की लंबाई कम हो गई है, वहाँ दूसरी ओर उसका लोहे का औजार तेस्सा भी सोने के रूप में परिवर्तित हो गया है। उसी रात बढ़ई को बाबा ने स्वप्न में दर्शन दिए तथा कहा कि तुम्हारी मेहनत का फल तुम्हें प्राप्त हो गया है, अब आगे से ऐसा कार्य करने में तुम्हारा हित नहीं होगा। तत्त्पश्चात् किसी भी व्यक्ति ने यहाँ स्थित तालाबों की गहराई मापने का प्रयास नहीं किया। बाबा आत्मा नंद द्वारा ईश्वर में विलीन होने के पश्चात् बाबा दौलतानन्द ने इस डेरे (आश्रम) का संचालन अपने कर कमलों में लिया। सन् 1978 ई. में बाबा दौलतानंद की निर्मम हत्या कर दी गई। आश्रम के परिसर में बाबा आत्मा नंद एवं एवं बाबा दौलता नंद की समाधियाँ विद्यमान हैं। वर्तमान में महामण्डलेश्वर ब्रह्मऋषि श्री श्री विष्णु देवानंद इस आश्रम को धार्मिक एवं विकासात्मक उन्नति की ओर अग्रसर कर रहे हैं। आश्रम में गौवंश की रक्षा हेतु गऊशाला का निर्माण किया गया है।लोग यहां आकर गायों के लिए चारा/ घास दान करते हैं और गौ सेवा करते हैं। इसके अतिरिक्त आश्रम में एक वैदिक संस्कृत महाविद्यालय है, जिसमें विद्यार्थी निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करते हैं। श्रद्धालुओं को सुबह-शाम लंगर प्रदान किया जाता है तथा चाय का भी प्रबन्ध होता है। भक्तजनों के ठहरने हेतु धर्मशाला भी है। आश्रम में पंच-भीष्म, संक्रान्ति, बैसाखी, गुरू पूर्णिमा तथा बाबा आत्मा नंद जी के श्राद्ध के अवसर पर विशाल मेले लगते हैं और भंडारे का आयोजन किया जाता है।भक्तजन मंदिर में साल में दो बार नई फसल चढ़ने भी आते हैं । इसके अतिरिक्त प्रत्येक रविवार को श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहाँ हरिनाम संकीर्तन में भाग लेने हेतु उपस्थित होते हैं। आश्रम में विविध देवी-देवताओं की मूर्तियों की प्रतिष्ठा हेतु एक भव्य मन्दिर का भी निर्माण किया गया है। जिसमें गणेशजी, राधा कृष्ण, शिव पार्वती, दुर्गा मां की भव्य दिव्य संगमरमर की मूर्तियों के अलावा बड़ी सी शिवलिंग और नंदी की मूर्ति स्थापित की गई है। मंदिर परिसर में अनेक प्रकार के सजावटी/ औषधीय पौधे लगाये गाए हैं।प्राचीन पीपल, बेर और वट के वृक्ष भी हैं। मंदिर से डेढ़ दो किलोमीटर की दूरी पर प्राचीन छोटा सा मंदिर है, जिसकी स्थानीय लोगों में अपार श्रद्धा,आस्था और विश्वास है। वर्तमान महंत विष्णुदेवानंद महाराज जी के दिशा निर्देशों और मार्गदर्शन में मंदिर जोगी पंगा का सौंदर्यकरण और विस्तारीकरण का काम निरंतर चल रहा है।
#शशि पाल प्रवक्ता इतिहास गांव हरसौर तहसील बड़सर जिला हमीरपुर हिमाचल प्रदेश