29/05/2026
अरे यह क्या?
श्री जगन्नाथ मंदिर के एक गुप्त कोने में यह कौन सी देवी हैं…
जिन्हें जंजीरों से बांधकर उल्टा लटकाया गया है?
हम सब जानते हैं कि एकादशी के दिन चावल खाना शास्त्रों में सबसे बड़ा पाप माना जाता है।
उसे नरक का द्वार तक कहा गया है।
लेकिन दोस्तों…
पूरी दुनिया में एक ऐसी जगह है…
जहां एकादशी के दिन भी भक्त पेट भरकर चावल खाते हैं।
और वह जगह है…
भगवान जगन्नाथ की पवित्र नगरी पुरी।
लेकिन आखिर ऐसा क्यों?
जब एकादशी माता ने भगवान जगन्नाथ के मंदिर में अपना नियम लागू करने की कोशिश की…
तो आखिर भगवान ने उन्हें बंदी क्यों बना लिया?
क्या सच में आज भी पुरी मंदिर के एक गुप्त स्थान पर एकादशी माता विराजमान हैं?
नियम और भगवान के प्रेम की टक्कर की यह अद्भुत कथा…
आपके रोंगटे खड़े कर देगी।
इस रहस्यमई कथा की शुरुआत सतयुग से होती है।
जब पृथ्वी पर पाप और अधर्म बहुत बढ़ गया था…
तब भगवान विष्णु ने संसार को पापों से मुक्त करने के लिए अपने दिव्य तेज से एक महान शक्ति को उत्पन्न किया।
वह शक्ति थीं…
एकादशी देवी।
उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी था।
आंखों में अग्नि समान प्रकाश…
मस्तक पर दिव्य आभा…
और शरीर से निकलती ऐसी ऊर्जा…
जिससे दानव तक कांप उठते थे।
भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया—
“देवी…
महीने में दो दिन तुम्हारा प्रभाव पूरे संसार पर रहेगा।
उस दिन जो भी मनुष्य अन्न और विशेषकर चावल का सेवन करेगा…
उसके भोजन में संसार के समस्त पाप प्रवेश कर जाएंगे।
लेकिन जो श्रद्धा से व्रत करेगा…
उसे मेरा धाम प्राप्त होगा।”
यह वरदान पाकर एकादशी माता अत्यंत शक्तिशाली हो गईं।
धीरे-धीरे तीनों लोकों में उनका प्रभाव फैल गया।
एकादशी आते ही लोगों के घरों में चूल्हे बुझ जाते।
राजा हो या भिखारी…
हर कोई भय और श्रद्धा से व्रत रखता।
यहां तक कि बड़े-बड़े ऋषि भी उस दिन चावल को हाथ लगाने से डरते थे।
एकादशी माता को अपनी शक्ति पर गर्व होने लगा।
उन्हें लगने लगा कि अब संसार में सबसे बड़ा नियम उन्हीं का है।
एक दिन अपने इसी अभिमान में डूबी हुई…
वह नीलांचल धाम यानी श्री जगन्नाथ पुरी पहुंच गईं।
लेकिन जैसे ही उन्होंने मंदिर के सिंहद्वार में प्रवेश किया…
उनके कदम वहीं रुक गए।
उनकी आंखें फैल गईं।
क्योंकि वहां जो दृश्य था…
वह उनके सारे नियमों के बिल्कुल विपरीत था।
आज एकादशी थी।
लेकिन मंदिर के आनंद बाजार में हजारों भक्त बैठे थे।
सबके सामने बड़े प्रेम से गरमा-गरम महाप्रसाद परोसा जा रहा था।
और उसमें क्या था?
चावल।
सफेद भाप छोड़ता हुआ महाप्रसाद।
भक्त बड़े आनंद से “जय जगन्नाथ!” बोलकर उसे खा रहे थे।
कहीं खिचड़ी…
कहीं दही पखाल…
कहीं मीठा चावल…
पूरा वातावरण महाप्रसाद की सुगंध से भरा हुआ था।
यह देखकर एकादशी माता का क्रोध भड़क उठा।
उन्होंने मन ही मन कहा—
“यह मेरा अपमान है!”
“पूरी दुनिया मेरे नियम का पालन करती है…
और यहां स्वयं भगवान के मंदिर में चावल बांटा जा रहा है?”
क्रोध में भरी एकादशी माता सीधे मंदिर के गर्भगृह की ओर बढ़ीं।
वहां रत्न सिंहासन पर भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान थे।
भगवान के चेहरे पर वही मधुर मुस्कान थी।
लेकिन एकादशी माता क्रोध से कांप रही थीं।
उन्होंने ऊंचे स्वर में कहा—
“प्रभु!
यह क्या हो रहा है?”
“आपने ही तो नियम बनाया था कि एकादशी के दिन अन्न और चावल में पाप का वास होगा!”
“तो फिर आपके मंदिर में यह पाप क्यों बांटा जा रहा है?”
“अगर इसे तुरंत नहीं रोका गया…
तो मेरा श्राप सबको लगेगा!”
भगवान जगन्नाथ शांत स्वर में मुस्कुराए।
फिर बोले—
“देवी…
तुम शांत हो जाओ।”
“बाहर जो भक्त खा रहे हैं…
वह साधारण अन्न नहीं है।”
“वह मेरा महाप्रसाद है।
कैवल्य है।
मेरे स्पर्श से पवित्र हुआ अन्न है।”
“जिस भोजन को मैं स्वयं स्वीकार कर चुका हूं…
उसमें कोई पाप प्रवेश नहीं कर सकता।”
लेकिन दोस्तों…
एकादशी माता का अहंकार बहुत बढ़ चुका था।
उन्होंने भगवान की बात मानने से इनकार कर दिया।
वह बोलीं—
“नियम सबके लिए एक समान होता है!”
“अगर आज आपके भक्त चावल खाएंगे…
तो उन्हें दंड अवश्य मिलेगा!”
इतना कहकर एकादशी माता क्रोध में बाहर की ओर मुड़ीं।
उनका इरादा भक्तों के हाथ से महाप्रसाद छीनने का था।
लेकिन तभी…
अचानक पूरा मंदिर कांप उठा।
वातावरण बदल गया।
मंदिर के दीपक तेज जलने लगे।
शंख की ध्वनि अपने आप गूंज उठी।
और अगले ही पल…
भगवान जगन्नाथ की गंभीर आवाज पूरे मंदिर में गूंज उठी—
“रुको देवी!”
अब भगवान के चेहरे से मुस्कान गायब हो चुकी थी।
उनकी विशाल आंखों में ऐसा तेज था…
जिसे देखकर देवता भी कांप जाएं।
भगवान बोले—
“तुमने मेरे महाप्रसाद को पाप कहने का दुस्साहस कैसे किया?”
“संसार में तुम्हारा नियम चल सकता है…
लेकिन मेरी पुरी में केवल प्रेम का नियम चलता है।”
“यहां भक्त भूखे नहीं रहेंगे।”
लेकिन एकादशी माता फिर भी नहीं मानीं।
उन्होंने कहा—
“मैं इन भक्तों का पुण्य छीन लूंगी!”
बस…
अब सीमा पार हो चुकी थी।
भगवान जगन्नाथ ने अपनी योगमाया का आह्वान किया।
अचानक आकाश से दिव्य जंजीरें प्रकट हुईं।
और देखते ही देखते…
उन्होंने एकादशी माता को पूरी तरह जकड़ लिया।
एकादशी माता घबरा गईं।
उन्होंने छूटने की बहुत कोशिश की…
लेकिन भगवान की शक्ति के सामने उनकी सारी शक्ति समाप्त हो गई।
भगवान ने आदेश दिया—
“इन्हें मंदिर के ईशान कोण में ले जाओ।”
अगले ही पल…
उन्हें मंदिर के एक गुप्त स्थान पर उल्टा लटका दिया गया।
भगवान बोले—
“तुम यहीं रहोगी।”
“और अपनी आंखों से देखोगी कि मेरे भक्त एकादशी के दिन भी प्रेम से महाप्रसाद ग्रहण करेंगे।”
“तुम सब देख सकोगी…
लेकिन किसी को रोक नहीं पाओगी।”
अब एकादशी माता का घमंड टूट चुका था।
वह रोने लगीं।
उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—
“प्रभु…
मुझसे भूल हो गई।”
“मैं आपकी महिमा नहीं समझ सकी।”
“लेकिन अगर मैं यहां बंधी रहूंगी…
तो क्या संसार मुझे भूल नहीं जाएगा?”
“मेरा सम्मान कौन करेगा?”
भगवान जगन्नाथ का हृदय करुणा से भर गया।
उन्होंने कहा—
“देवी…
मैं तुम्हारा अपमान नहीं होने दूंगा।”
“आज से मेरी पुरी में एक नई परंपरा शुरू होगी।”
“एकादशी के दिन भक्त महाप्रसाद अवश्य ग्रहण करेंगे…”
“लेकिन उससे पहले वे तुम्हें प्रणाम करेंगे।”
“वे महाप्रसाद को अपने मस्तक से लगाएंगे…
और कहेंगे—
हे एकादशी माता…
यह साधारण अन्न नहीं…
स्वयं प्रभु का महाप्रसाद है।
इसलिए हमारा व्रत खंडित ना हो।”
यह सुनकर एकादशी माता की आंखों से आंसू बहने लगे।
उन्होंने भगवान के चरण पकड़ लिए।
फिर बोलीं—
“प्रभु…
आज से जो भक्त इस भाव से आपका महाप्रसाद ग्रहण करेगा…
मैं उसे दंड नहीं दूंगी।”
“बल्कि उसे दुगना पुण्य प्रदान करूंगी।”
तभी से आज तक…
पुरी जगन्नाथ मंदिर दुनिया की इकलौती ऐसी जगह मानी जाती है…
जहां एकादशी के दिन भी भक्त बड़े प्रेम से महाप्रसाद ग्रहण करते हैं।
वहां मान्यता है कि अगर एकादशी के दिन भगवान का महाप्रसाद मिले…
और कोई उसे ठुकरा दे…
तो वह स्वयं भगवान का अपमान माना जाता है।
आज भी मंदिर के एक गुप्त हिस्से में एकादशी माता का स्थान बताया जाता है।
जहां भक्त श्रद्धा से उन्हें प्रणाम करते हैं।
यह कथा हमें एक बहुत बड़ा संदेश देती है—
धर्म के नियम महत्वपूर्ण हैं…
लेकिन भगवान का प्रेम…
उनका प्रसाद…
और भक्तों के प्रति उनकी करुणा…
हर नियम से ऊपर है।
तो दोस्तों…
अगर कभी जीवन में जगन्नाथ पुरी जाने का सौभाग्य मिले…
और एकादशी के दिन महाप्रसाद प्राप्त हो…
तो उसे प्रेम से ग्रहण जरूर कीजिएगा।
क्योंकि वह केवल भोजन नहीं…
स्वयं भगवान का आशीर्वाद होता है।
प्रेम से बोलिए…
जय जगन्नाथ।