Radha Madhav Creations

Radha Madhav Creations showcasing kanha ji's dresses

04/06/2026

एक संत बरसाना में रहते थें और हर रोज सुबह उठकर यमुना जी में स्नान करके राधा जी के दर्शन करने जाया करते थें। यह नियम हर रोज का था। जब तक राधा रानी के दर्शन नहीं कर लेते थें, तब तक जल भी ग्रहण नहीं करते थें। दर्शन करते करते तकरीबन उनकी उम्र अस्सी वर्ष की हो गई। आज सुबह उठकर रोज की तरह उठे और यमुना में स्नान किया और राधा रानी के दर्शन को चलें गए। मन्दिर के पट खुले और राधा रानी के दर्शन करने लगे।

दर्शन करते करते संत के मन में भाव आया की :- "मुझे राधा रानी के दर्शन करते करते आज अस्सी वर्ष हो गए लेकिन मैंने आज तक राधा रानी को कोई भी वस्त्र नहीं चढ़ाया। लोग राधा रानी के लिए कोई नारियल लाता है, कोई चुनरिया लाता है, कोई चूड़ी लाता है, कोई बिन्दी लाता है, कोई साड़ी लाता है, कोई लहंगा चुनरिया लाता है। लेकिन मैंने तो आज तक कुछ भी नहीं चढ़ाया है।"

यह विचार संत जी के मन में आया की "जब सभी मेरी राधा रानी लिए कुछ ना कुछ लाते हैं, तो मैं भी अपनी राधा रानी के लिए कुछ ना कुछ लेकर जरूर आऊंगा। लेकिन क्या लाऊं? जिससे मेरी राधा रानी खुश हो जायें ?

तो संन्त जी यह सोच कर अपनी कुटिया में आ गए। सारी रात सोचते सोचते सुबह हो गई उठे उठ कर स्नान किया और आज अपनी कुटिया में ही राधा रानी के दर्शन पूजन कियें।

दर्शन के बाद मार्केट में जाकर सबसे सुंदर वाला लहंगा चुनरिया का कपड़ा लायें और अपनी कुटिया में आकर के अपने ही हाथों से लहंगा-चुनरिया को सिला और सुंदर से सुंदर उस लहंगा-चुनरिया में गोटा लगायें। जब पूरी तरह से लहंगा चुनरिया को तैयार कर लिया तो मन में सोचा कि "इस लहंगा चुनरिया को अपनी राधा रानी को पहनाऊंगा तो बहुत ही सुंदर मेरी राधा रानी लगेंगी।"

यह सोच करके आज संन्त जी उस लहंगा-चुनरिया को लेकर राधा रानी के मंदिर को चले। मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगे और अपने मन में सोच रहे हैं , "आज मेरे हाथों के बनाएं हुए लहंगा चुनरिया राधा रानी को पहनाऊगां तो मेरी लाड़ली खूब सुंदर लगेंगी" यह सोच कर जा रहे हैं।

इतने मे एक बरसाना की लड़की (लाली) आई और बाबा से कहती है :- "बाबा आज बहुत ही खुश हो, क्या बात है ? बाबा बताओ ना !"

तो बाबा ने कहा कि :- "लाली आज मे बहुत खुश हूँ। आज मैं अपने हाथों से राधा रानी के लिए लहंगा-चुनरिया बनाया है। इस लहंगा चुनरिया को राधा रानी जी को पहनाऊंगा और मेरी राधा रानी बहुत सुंदर दिखेंगी।"

उस लाली ने कहा :- "बाबा मुझे भी दिखाओ ना आपने लहंगा चुनरिया कैसी बनाई है।"

लहंगा चुनरिया को देखकर वो लड़की बोली :- "अरे बाबा राधा रानी के पास तो बहुत सारी पोशाक है। तो ये मुझे दे दो ना।"

तो महात्मा बोले की :- "बेटी तुमको मैं दूसरी बाजार से दिलवा दूंगा। ये तो मै अपने हाथ से बनाकर राधा रानी के लिये लेकर जा रहा हूँ। तुमको और कोई दुसरा दिलवा दूंगा।"

लेकिन उस छोटी सी बालिका ने उस महात्मा का दुपट्टा पकड़ लिया "बाबा ये मुझे दे दो", पर संत भी जिद करने लगे की "दूसरी दिलवाउंगा ये नहीं दूंगा।"

लेकिन वो बच्ची भी इतनी तेज थी की संत के हाथ से छुड़ा लहंगा-चुनरिया को छीन कर भाग गई।

अब तो बाबा को बहुत ही दुख लगा की "मैंने आज तक राधा रानी को कुछ नहीं चढ़ाया। लेकिन जब लेकर आया तो लाली लेकर भाग गई। "मेरा तो जीवन ही खराब है। अब क्या करूँगा?"

यह सोच कर संन्त उसी सीढ़ियों में बैठे करके रोने लगें।

इतने मे कुछ संत वहाँ आयें और पूछा :- "क्या बात है, बाबा ? आप क्यों रो रहे हैं।" तो बाबा ने उन संतों को पूरी बात बताई, संतों ने बाबा को समझाया और कहा कि :- "आप दुखी मत हो कल दूसरी लहंगा चुनरिया बना के राधा रानी को पहना देना। चलो राधा रानी के दर्शन कर लेते हैं।"

इस प्रकार संतो ने बाबा को समझाया और राधा रानी के दर्शन को लेकर चले गए। रोना तो बन्द हुआ लेकिन मन ख़राब था। क्योंकि कामना पूरी नहीं हुई ना, तो अनमने मन से राधा रानी का दर्शन करने संत जा रहे थें और मन में ये ही सोच रहे हैं " की मुझे लगता है की किशोरी जी की इच्छा नहीं थीं , शायद राधा रानी मेरे हाथों से बनी पोशाक पहनना ही नहीं चाहती थीं ! ", ऐसा सोचकर बड़े दुःखी होकर जा रहे हैं।

मंदिर आकर राधा रानी के पट खुलने का इन्तजार करने लगें।

थोड़े ही देर बाद मन्दिर के पट खुले तो संन्तो ने कहा :- "बाबा देखो तो आज हमारी राधा रानी बहुत ही सुंदर लग रही हैं।"

संतों की बात सुनकर के जैसे ही बाबा ने अपना सिर उठा कर के देखा तो जो लहंगा चुनरिया बाबा ने अपने हाथों से बनाकर लाये थें, वही आज राधा रानी ने पहना था।

बाबा बहुत ही खुश हो गए और राधा रानी से कहा हे "राधा रानी, आपको इतना भी सब्र नहीं रहा आप मेरे हाथों से मंदिर की सीढ़ियों से ही लेकर भाग गईं ! ऐसा क्यों?"

सर्वेश्वरी श्री राधा रानी ने कहा की "बाबा आपके भाव को देखकर मुझ से रहा नहीं गया और ये केवल पोशाक नहीं है, इस में आपका प्रेम है। इस लिए तो मैं खुद ही आकर के आपसे लहंगा चुनरिया छीन कर भाग गई थी।"

इतना सुनकर के बाबा भाव विभोर हो गये और बाबा ने उसी समय किशोरी जी का धन्यवाद किया।

🙏 !! जय श्री राधे राधे !! 🙏

02/06/2026

विधि का विधान....

श्री राम का विवाह और राज्याभिषेक, दोनों शुभ मुहूर्त देख कर किए गए थे; फिर भी न वैवाहिक जीवन सफल हुआ, न ही राज्याभिषेक...

और जब मुनि वशिष्ठ से इसका उत्तर मांगा गया, तो उन्होंने साफ कह दिया

"सुनहु भरत भावी प्रबल,
बिलखि कहेहूं मुनिनाथ।
हानि लाभ, जीवन मरण,
यश अपयश विधि हाथ।।"

अर्थात - जो विधि ने निर्धारित किया है, वही होकर रहेगा!

न प्रभु राम के जीवन को बदला जा सका, न भगवान कृष्ण के!

औऱ न ही महादेव शिव जी सती की मृत्यु को टाल सके, जबकि महामृत्युंजय मंत्र उन्हीं का आवाहन करता है!

न गुरु अर्जुन देव जी और न ही गुरु तेग बहादुर साहब जी और दश्मेश पिता गुरू गोबिन्द सिंह जी, अपने साथ होने वाले विधि के विधान को टाल सके, जबकि आप सब समर्थ थे!

रामकृष्ण परमहंस भी अपने कैंसर को न टाल सके!

न रावण अपने जीवन को बदल पाया, न ही कंस, जबकि दोनों के पास समस्त शक्तियाँ थी!

एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठ कर कैलाश पर्वत पर गए। द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर श्री हरि खुद शिव से मिलने अंदर चले गए। तब कैलाश की प्राकृतिक शोभा को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे कि तभी उनकी नजर एक खूबसूरत छोटी सी चिड़िया पर पड़ी। चिड़िया कुछ इतनी सुंदर थी कि गरुड़ के सारे विचार उसकी तरफ आकर्षित होने लगे।

उसी समय कैलाश पर यम देव पधारे और अंदर जाने से पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की दृष्टि से देखा। गरुड़ समझ गए उस चिड़िया का अंत निकट है और यमदेव कैलाश से निकलते ही उसे अपने साथ यमलोक ले जाएँगे।

गरूड़ को दया आ गई। इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे। उसे अपने पंजों में दबाया और कैलाश से हजारो कोश दूर एक जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया और खुद वापिस कैलाश पर आ गया। आखिर जब यम बाहर आए तो गरुड़ ने पूछ ही लिया कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी नजर से क्यों देखा था।

यम देव बोले "गरुड़ जब मैंने उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वो चिड़िया कुछ ही पल बाद यहाँ से हजारों कोस दूर एक नाग द्वारा खा ली जाएगी। मैं सोच रहा था कि वो इतनी जल्दी इतनी दूर कैसे जाएगी, पर अब जब वो यहाँ नहीं है तो निश्चित ही वो मर चुकी होगी।"

गरुड़ समझ गये "मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी भी चतुराई की जाए।"

इसलिए श्री कृष्ण कहते है- करता तू वह है, जो तू चाहता है...परन्तु होता वह है, जो में चाहता हूँ..कर तू वह, जो मैं चाहता हूँ...फिर होगा वो, जो तू चाहेगा ।

मानव अपने जन्म के साथ ही जीवन, मरण, यश, अपयश, लाभ, हानि, स्वास्थ्य, बीमारी, देह, रंग, परिवार, समाज, देश-स्थान सब पहले से ही निर्धारित करके आता है!

इसलिए सरल रहें, सहज, मन, वचन और कर्म से सद्कर्म में लीन रहें......
. राधे राधे 🌹🙏

11/04/2026

*रामायण की एक और अद्धभुत कथा:-*

*समझिये कैसे आज का दु:ख कल का सौभाग्य बनता है*.....

महाराज दशरथ को जब संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी तब वो बड़े दुःखी रहते थे...पर ऐसे समय में उनको एक ही बात से होंसला मिलता था जो कभी उन्हें आशाहीन नहीं होने देता था...

*मजे की बात ये कि इस होंसले की वजह किसी ऋषि-मुनि या देवता का वरदान नहीं बल्कि श्रवण के पिता का श्राप था....*

दशरथ जब-जब दुःखी होते थे तो उन्हें श्रवण के पिता का दिया श्राप याद आ जाता था... (कालिदास ने रघुवंशम में इसका वर्णन किया है)

श्रवण के पिता ने ये श्राप दिया था कि *''जैसे मैं पुत्र वियोग में तड़प-तड़प के मर रहा हूँ वैसे ही तू भी तड़प-तड़प कर मरेगा.....''*

*दशरथ को पता था कि ये श्राप अवश्य फलीभूत होगा और इसका मतलब है कि मुझे इस जन्म में तो जरूर पुत्र प्राप्त होगा.... (तभी तो उसके शोक में मैं तड़प के मरूँगा)*

*यानि यह श्राप दशरथ के लिए संतान प्राप्ति का सौभाग्य लेकर आया....*

ऐसी ही एक घटना सुग्रीव के साथ भी हुई....

सुग्रीव जब माता सीता की खोज में वानर वीरों को पृथ्वी की अलग - अलग दिशाओं में भेज रहे थे.... तो उसके साथ-साथ उन्हें ये भी बता रहे थे कि किस दिशा में तुम्हें क्या मिलेगा और किस दिशा में तुम्हें जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिये....

प्रभु श्रीराम सुग्रीव का ये भगौलिक ज्ञान देखकर हतप्रभ थे...

उन्होंने सुग्रीव से पूछा कि सुग्रीव तुमको ये सब कैसे पता...?

तो सुग्रीव ने उनसे कहा कि... *''मैं बाली के भय से जब मारा-मारा फिर रहा था तब पूरी पृथ्वी पर कहीं शरण न मिली... और इस चक्कर में मैंने पूरी पृथ्वी छान मारी और इसी दौरान मुझे सारे भूगोल का ज्ञान हो गया....''*

*सोचिये अगर सुग्रीव पर ये संकट न आया होता तो उन्हें भूगोल का ज्ञान नहीं होता और माता जानकी को खोजना कितना कठिन हो जाता...*

इसीलिए किसी ने बड़ा सुंदर कहा है :-

*"अनुकूलता भोजन है, प्रतिकूलता विटामिन है और चुनौतियाँ वरदान है और जो उनके अनुसार व्यवहार करें.... वही पुरुषार्थी है...."*

*ईश्वर की तरफ से मिलने वाला हर एक पुष्प अगर वरदान है.......तो हर एक काँटा भी वरदान ही समझो....*

*मतलब.....अगर आज मिले सुख से आप खुश हो...तो कभी अगर कोई दुख,विपदा,अड़चन आजाये.....तो घबराना नहीं.... क्या पता वो अगले किसी सुख की तैयारी हो....*

*सदैव सकारात्मक रहें..*

💐💐💐

07/04/2026

🍀🌷 राधे राधे🌷🌿🌹🙏🌹
🙏Pranam Thakur Ji🙏

वृंदावन में बाँकेबिहारी जी मंदिर में बिहारी जी की काले रंग
की प्रतिमा है। इस प्रतिमा के विषय में मान्यता है कि इस
प्रतिमा में साक्षात् श्रीकृष्ण और राधाजी समाहित हैं , इसलिए
इनके दर्शन मात्र से राधा-कृष्ण के दर्शन के फल की प्राप्ति होती है ।
इस प्रतिमा के प्रकट होने की कथा और लीला बड़ी ही रोचक और
अद्भुत है, इसलिए हर वर्ष मार्गशीर्ष मास
की पंचमी तिथि को बाँकेबिहारी मंदिर में
बाँकेबिहारी प्रकटोत्सव मनाया जाता है।
बाँकेबिहारी जी के प्रकट होने की कथा-संगीत सम्राट तानसेन के गुरु
स्वामी हरिदास जी भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। वृंदावन में
स्थित श्रीकृष्ण की रास-स्थली निधिवन में बैठकर भगवान को अपने
संगीत से रिझाया करते थे। भगवान की भक्ति में डूबकर हरिदास
जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और
गायन से रीझकर भगवान श्रीकृष्ण इनके सामने आ गये। हरिदास
जी मंत्रमुग्ध होकर श्रीकृष्ण को दुलार करने लगे। एक दिन इनके एक
शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्रीकृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें
भी साँवरे सलोने का दर्शन करवाइये। इसके बाद हरिदास
जी श्रीकृष्ण की भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा-कृष्ण की युगल
जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ गया और
गाने लगे-
भाई री सहज जोरी प्रकट भई,
जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे।
प्रथम है हुती अब हूँ आगे हूँ रहि है न टरि है तैसे।
अंग-अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे।
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे।
श्रीकृष्ण और राधाजी ने हरिदास के पास रहने की इच्छा प्रकट की।
हरिदास जी ने कृष्णजी से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूँ। आपको लंगोट
पहना दूँगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहाँ से लाकर दूँगा। भक्त
की बात सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कराए और राधा-कृष्ण की युगल
जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह के रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने
इस विग्रह को ‘बाँकेबिहारी’ नाम दिया। बाँके बिहारी मंदिर में
इसी विग्रह के दर्शन होते हैं। बाँके बिहारी के विग्रह में राधा-कृष्ण
दोनों ही समाए हुए हैं, जो भी श्रीकृष्ण के इस विग्रह का दर्शन
करता है, उसकी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
कुंजबिहारी...श्री हरिदास....

30/10/2025

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18/09/2025

बंधुओं,आज मैं मीरा बाई जी के अंतिम पद से आप सभी को अवगत कराना चाहता हूं, वो मीराबाई जिन्हें बाल्यावस्था में ही गिरधर गोपाल से प्रीति हो गई, खेल खेल में गिरधर को ही अपना पति मान बैठी, मीराबाई ने श्री रविदास जी को अपना गुरु बनाया, उनसे ही दीक्षा ग्रहण की ,जब मीराबाई सयानी हुई, तो पिता जी ने ब्याह के लिए मन की बात जानना चाही,पर मीराबाई ने ब्याह करने से मना कर दिया, लेकिन समाज का डर पिता को सताता रहा, अन्ततः उन्होंने मीराबाई का ब्याह बिना उसके मन के ही कर दिया,मेड़ता में जन्म लिया, मेवाड़ में ब्याह हुआ, ब्याह के बाद भी मीराबाई पूरी तरह से पवित्र थी, मीराबाई में इतना तेज था, मीराबाई के तेज़ के प्रभाव से कभी भी उनके पति ने उनके पास आने की इच्छा नहीं जताई,मीराबाई ने एक बार अपने पति से एक ऐसी बात कह दी,वो बात पति भोजराज के हृदय में जा कर बैठ गई, पति होने के बाद भी उन्होंने मीराबाई को कभी भी स्पर्श नहीं किया, कुछ समय बीतने के बाद असमय ही पति की मृत्यु हो गई,ससुर भी नहीं रहें, देवरों ने मीराबाई को बहुत परेशान किया,ससुराल में कितना अत्याचार उन पर हुआ जिसका बखान नहीं किया जा सकता, बहुत सताती गई मीरा,लेकिन श्री गोपाल जी के प्रति मीरा की प्रीति , मीरा का प्यार नहीं कमजोर हुआ, फिर श्री गोपाल जी की प्रेरणा से बृंदावन में आ गई, बृंदावन में मीराबाई बहुत समय तक रही, धीरे धीरे वृंदावन में मीराबाई की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई, बहुत से लोग अब मीराबाई से मिलने आने लगे, मीराबाई ने एक दिन श्री ठाकुर जी से प्रार्थना किया,हे नाथ, मुझे इस वृंदावन से कहीं दूर ले चलो, यहां रहकर मेरा भजन नहीं हो पा रहा है,तब श्री ठाकुर जी की प्रेरणा से मीराबाई द्वारिका पहुंची, और वहां रहने लगी, मीराबाई के मेवाड़ छोड़ते ही वहां अकाल पड़ गया, भुखमरी आ गई,लोग दाने दाने को मोहताज हो गये,कुछ समय बाद मेवाड़ के कुछ ज्ञानी जन ,संत, बुद्धिजीवी, मीराबाई को वापस लाने के लिए द्वारिका की तरफ कूच किये, मीराबाई ने वापस जाने से मना कर दिया,तब वो सभी समुद्र किनारे गोमती के तट पर अनशन पर बैठ गए, मीराबाई को जब पता चला, कि मेवाड़ से आये सभी वैष्णव संत जन अनशन पर हैं,तो वो जाकर सभी संतों वैष्णवों को प्रणाम किया ,उन सभी को बहुत समझाने का प्रयास किया,जब सभी न जाने को तैयार हुए तब मीराबाई ने उन सभी संतों के सम्मुख में एक शर्त रखी यदि मेरे द्वारिकाधीश मुझे जाने के लिए कह देते हैं, तभी मैं वापस आ सकती हूं, मीराबाई सभी लोगों के साथ श्री द्वारिकाधीश पहुंची, वहां मंगला की आरती हुई ही थी, जैसे ही मीराबाई ने श्री द्वारकाधीश जी का मुख मण्डल जैसे ही देखा,नयन सजल हो गये, अश्रु धार बह पड़ी , वाणी गदगद हो गई तभी मीराबाई ने श्री द्वारकाधीश जी को अपने जीवन का अंतिम पद सुनाया,
साजन सुध ज्यौ जानो त्यौ लीजो,
तुम बिन मेरा और न कोई,
कृपा रावरी कीजो,
दिवस न भूख ,रैन न निदरा,
यूं तन पल पल छीजो,
साजन सुध ज्यौ जानो त्यौ लीजो,
मीर के प्रभु गिरधर नागर,
मिल बिछुरन मत दीजो,
इतना ही सुनते ही, श्री द्वारकाधीश साक्षात मीराबाई के सम्मुख में प्रगट हो गए, मंदिर के गर्भ गृह में इतना प्रकाश फैल गया मानो सूर्य चंद्रमा एक साथ प्रगट हो गए हो, मीराबाई गर्भगृह की तरफ बढ़ी जा रही है, जैसे ही मीराबाई प्रभु के समीप पहुंची, मेरे श्री द्वारकाधीश भगवान ने आगे बढ़कर अपने दोनों हाथों को फैला लिया, मीराबाई भगवान के हृदय से लिपट गई, श्री द्वारकाधीश भगवान ने मीराबाई को सदेह अपने अंदर समा लिया, जैसे जैसे प्रकाश घटता गया,सब लोग मीराबाई को खोजने लगे,तब तक पुजारी जी की नजर भगवान के श्री विग्रह पर पड़ी, तो पुजारी जी ने इतना देखा,कि मीराबाई की चुनरी का अंतिम छोर श्री द्वारकाधीश जी के हृदय में प्रविष्ट होता जा रहा है,
इस प्रकार इसी कलिकाल में मीराबाई भगवान को सदेह प्राप्त हो गई!

जय श्री कृष्ण राधे राधे 🌹

13/08/2025

*मेरे हृदय मे हमेशा तेरा वास रहें.,*
*मेरे सिर पर हमेशा तेरा हाथ रहें.*

*रास्ते हो चाहे कितने भी कठिन.*
*बस हर पल कान्हा तेरा साथ रहे.*

...जय जय श्री राधे

बात रही वृन्दावन की तो शब्दों में व्यक्त करना मूर्खता है। इसके लिए तो यहाँ आना पड़ता है वृन्दावन को जीना पड़ता है। और आने ...
04/08/2025

बात रही वृन्दावन की तो शब्दों में व्यक्त करना मूर्खता है। इसके लिए तो यहाँ आना पड़ता है वृन्दावन को जीना पड़ता है। और आने के बाद अगर सड़क पे चौराहों की भीड़ में ऑटो, रिक्शों वालों की राधे राधे सुन सकोगे तो जान सकोगे की वृन्दावन क्या है।
यहाँ की गलियों में राधे राधे जो सुन सकोगे तो जान सकोगे की वृन्दावन क्या है।
जब जन्म और मृत्यु दोनो संस्कार एक से होते देख जीवन का दर्शन कर सकोगे तो जान सकोगे की वृन्दावन क्या है।
यहाँ के मंदिरों की घंटियों में जीवन का सार है। यहाँ के घाटों पर बैठ के अनपढ़ भी शंकराचार्य बन जाता है। जर्रे जर्रे से राधे कृष्ण की ध्वनि आती है।

श्री कृष्ण यानि मंगल।
हर आरती के बाद, हर ख़ुशी के बाद यहाँ लोग हाथ उठा के बोलते है राधे राधे।
ये है वृन्दावन, इसकी आत्मा इसकी पहचान है यहाँ के घाट, यहाँ की गलियाँ, यहाँ के मंदिर, यहाँ का दर्शन, यहाँ के लोग।
बड़े बड़े विद्वान लोग यहाँ आ के अपनी विद्वत्ता भूल कर यही रम जाते है।
राधे राधे हमेशा गूंजता रहे, घंटियों का निनाद ना रुके, यमुना मैया की लहरे यूँ ही अनवरत चले, वो प्रेम ना कही गुम हो जाए, वो तहज़ीब ना कहीं गुम हो जाए बस इतना ही, मैं तो यही चाहता हूँ कि ये जीवन वृन्दावन की आस में ही बीते....यमुना मैया हमेशा मेरी आंखों के सामने हो...कानो में घंटियों की आवाज के साथ राधे राधे आवाज आये..!!
जय जय श्री राधे 🙏

29/07/2025
29/06/2025

जब मीरा, राधा, त्रिपुरदास, सूरदास ये आपके अपने लगें
जब भजन, कथा, कविता में आप स्वयं को पाएं —
जब लगे कि यह सब तो आपकी ही कथा है —
तो जान लीजिए, कृष्ण ने आपको चुन.... लिया है......

यदि "श्याम", "गोविंद", "माधव", "राधे" — ये नाम लेते ही
आपका रोम-रोम पुलकित हो जाए,
आँखें सजल हो जाएँ,
तो जान लीजिए, कृष्ण ने आपको चुन.... लिया है।

Address

Purhiran
Hoshiarpur
146001

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