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आज  एक ऐसे प्रसिद्ध  फिल्मकार का जन्म दिवस है जिसने फिल्मों में कहानी लेखक के रूप में शुरूआत करते हुए आगे अभिनय  भी किया...
20/02/2026

आज एक ऐसे प्रसिद्ध फिल्मकार का जन्म दिवस है जिसने फिल्मों में कहानी लेखक के रूप में शुरूआत करते हुए आगे अभिनय भी किया और निर्माता_ निर्देशक भी बन गए, ये है _आई एस जौहर
आपका जन्म सन १९२० में अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ था पूरा नाम था इंद्रसेन जौहर , उनकी पढ़ाई भी वहीं पूरी हुई , पढ़ाई के मामले में वो उस समय के सबसे अधिक पढ़े लिखे व्यक्ति थे उन्होंने अर्थ शास्त्र और राजनीति शास्त्र में डबल एम ए की डिग्री हासिल की थी , आप बहुत ही बुद्धिमान होकर उन्हे कहानियां लिखने का शौक था
सन १९४७ के अगस्त में देश के विभाजन की हल चल शुरू हुई उसी समय जौहर साहब अपने परिवार सहित एक शादी में शामिल होने के लिए पटियाला आए उधर लाहौर में दंगे शुरू हो गए और वो वापस अपने पुश्तैनी घर नही लौट पाए , कुछ दिनों जालंधर में छोटे मोटे काम करने के बाद फिल्मों में भाग्य आजमाने मुंबई आए यहां उनका परिचय फिल्मकार " रूप के शौरी" से हुआ उन्होंने सन १९४९ में जोहर साहब की लिखी कहानी पर फिल्म बनाई " एक थी लड़की " इस में उन्होंने अभिनय भी किया था, नायक थे मोतीलाल , यहां से उनके लेखन और अभिनय की यात्रा शुरू हो गई, फिल्मकार बी आर चोपड़ा उन्हे बचपन से पहचानते थे उन्होंने जोहर साहब कहा मुझे तुम्हारी कोई ऐसी कहानी दो जिसपर मैं सुपरहिट फिल्म बना सकू, इस तरह सन १९५१ में " अफसाना " फिल्म बनी , कहानी थी जोहर साहब की ,नायक थे अशोक कुमार, इस फिल्म की सफलता से आई एस जौहर और बी आर चोपड़ा दोनो की पहचान कायम हो गई, इसी दौरान जोहर साहब ने सहायक निर्देशक का काम शुरू किया, उनके साथ यश चोपड़ा भी यही काम करने लगे , यश चोपड़ा साहब हमेशा आई एस जौहर को अपना गुरु मानते रहे हैं
बहुमुखी प्रतिभा के धनी जोहर साहब के अभिनय की विशेषता थी सहज , स्वाभाविक अभिनय, जिसका शानदार उदाहरण है फिल्म " जॉनी मेरा नाम" में उनकी तिहरी भूमिका , जिसके लिए उन्हे सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था, अपने अभिनय के दौर में उन्हे कुछ हॉलीवुड की फिल्मों में भी काम करने का अवसर मिला जिनमे सन १९५८ की" हेरी ब्लेक" , ६२ की" लारेंस ऑफ़ अरेबिया "( ऑस्कर विजेता फिल्म ), ६७ की " नॉर्थ वेस्ट फ्रांटियर , डेथ ऑफ द नाइल" , सिक्रेट ऑफ़ द हिंदू टेंपल्स , उन्होंने सन १९७८ की अमेरिकन टी वी धारावाहिक " माया " में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है , अपने सफलता के दौर में उन्होंने स्वयं की निर्माण कंपनी स्थापित कर _ जोहर मेहमूद इन गोवा, जोहर मेहमूद इन हांगकांग, जोहर इन काश्मीर , ५ राइफल्स , जाय बंगला देश , नसबंदी जैसी फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया, आपने लगभग १३० फिल्मों में अभिनय किया है, उनमें से कुछ है _ नास्तिक, शर्त , हम सब चोर है, मिस इंडिया, एक गांव की कहानी, अपलम चपलम, मैं शादी करने चला , बनारसी ठग, तीन देवियां, नमस्ते जी, लड़का लड़की, श्रीमान जी, अप्रैल फूल, दिल ने फिर याद किया, राज, शागिर्द, अनिता, हाय मेरा दिल, दो ठग, सफर, दास्तान , गोमती के किनारे , जोशीला, तीन चोर, आज की ताजा खबर ,गोपीचंद जासूस आदि
सन १९८४ में आई एस जौहर साहब का स्वर्गवास हो गया , उन्हे विनम्र श्रद्धांजलि, प्रस्तुत है उनका चित्र मेरे से दिनांक १६ फरवरी २०२६

मित्रो , हमारी हिंदी फिल्मी दुनिया के सुनहरे युग के प्रारंभ होने के पूर्व काल से ही हिन्दी फिल्मों के केंद्र बंबई और पून...
20/02/2026

मित्रो ,
हमारी हिंदी फिल्मी दुनिया के सुनहरे युग के प्रारंभ होने के पूर्व काल से ही हिन्दी फिल्मों के केंद्र बंबई और पूना में कार्यरत कई प्रतिभाशाली लेखक , निर्माता , निर्देशक अपनी फिल्मों के माध्यम से लोकप्रियता और पैसा कमा रहे थे इनमें देविका रानी , व्ही शांताराम, के आसिफ़, सोहराब मोदी, किशोर साहू , महबूब खान जैसे फिल्मकार शामिल थे, हिन्दी फिल्मों का कारोबार बड़ी अच्छी कमाई कर रहा था दूसरी ओर दक्षिण भारत के चार राज्यों मद्रास ( अब तामील नाडु ) में तमिल भाषा , मैसूर ( अब कर्नाटक ) में कन्नड़ , केरल में मलयालम और आंध्र प्रदेश में तेलुगु भाषा में वहां के प्रतिभावान फिल्मकार अपनी फिल्मों के जरिए लोकप्रियता और पैसे कमा रहे थे , परंतु इस फिल्मों का प्रदर्शन सीमित क्षेत्रों में ही होता था , जबकि हिंदी फिल्मों का प्रदर्शन लगभग पूरे देश में होता था , इस बात को व्यवसाय की दृष्टिकोण से देखते _ समझते हुए दक्षिण भारत के फिल्म निर्माताओं ने हिंदी में फिल्मे बनाने का निर्णय लिया, सबसे पहले मद्रास की जेमिनी फिल्म्स के एस एस वासन और एस एस बालन ने फिल्म " चन्द्रलेखा " का निर्माण करके सन १९४८ में इसे रिलीज किया , उल्लेखनीय है कि इस फिल्म के क्लाइमेक्स के लिए एक भव्य सेट बनाकर इसमें नृत्य गीत फिल्माया गया था, जिसमें सैकड़ों बड़े बड़े नगाड़ों पर खड़े होकर नृत्यांगनाओ को नृत्य करते दर्शाया था, आने वाले समय में ऐसा ही भव्य सेट राजकपूर साहब ने अपनी फिल्म " आवारा" के लिए फिल्माया था
चंद्रलेखा फिल्म के सफल प्रदर्शन के बाद कई अन्य दक्षिण भारतीय फिल्म कंपनिया जैसे _ ए वीं एम मद्रास , वासु फिल्म्स मद्रास , प्रसाद प्रोडक्शन, चित्रालय, वीनस पिक्चर्स, आदि फिल्म बनाने में सक्रिय हो गई , ये सिलसिला तब से अब तक जारी है
दक्षिण भारतीय फिल्मकारों ने अपनी शुरुआती हिन्दी फिल्मों में वहीं के कलाकारों का उपयोग किया, लेकिन धीरे धीरे उन्होंने हिंदी फिल्मों के स्टार कलाकारों को अपनी फिल्मों में लेना शुरू किया इनमे मुख्य रहे , राजेन्द्र कुमार, सुनील दत्त , जितेन्द्र, महमूद , लेखक _ गीतकार भारत व्यास , राजेंद्र कृष्ण , इंडीवर , संगीत निर्देशक रवि , बप्पी लाहिरी आदि
दक्षिण भारत की कंपनियों की हिंदी की कुछ फिल्मे है _ जेमिनी की _ मंगला , पैगाम , इंसानियत , घूंघट , घराना , जिंदगी , गृहस्थी, शतरंज , पैसा या प्यार, लाखों में एक
ए वी एम की _ चोरी चोरी , छाया, मेहरबान , मै चुप रहूंगी , खानदान
प्रसाद प्रोडक्शन की _ शारदा , छोटी बहन , ससुराल , हमराही , बेटी बेटे, दादी मां, मिलन , जीने की राह , राजा और रंक, खिलौना , एक दुजे के लिए आदि
कुछ अन्य फिल्मे है _ आजाद , दिल एक मंदिर , प्यार किए जा , भरोसा , नई रोशनी , राम और श्याम, आदमी , इज्जत , नन्हा फरिश्ता , सूरज , साथी , धरती , तोहफा , आदि लंबी सूची है
प्रस्तुत है जेमिनी मद्रास कंपनी की दो फिल्मों के पोस्टर के चित्र मेरे संग्रह से
दिनांक १७ फरवरी २०२६

मित्रों, आज एक ऐसी अभिनेत्री का जन्म दिवस है जिन्हे सुनहरे युग के समय की कॉलेज  की छात्राएं अपना आदर्श मानती थीं , ये है...
20/02/2026

मित्रों, आज
एक ऐसी अभिनेत्री का जन्म दिवस है जिन्हे सुनहरे युग के समय की कॉलेज की छात्राएं अपना आदर्श मानती थीं , ये है नलिनी जयवंत "
आपका जन्म सन १९२६ में हुआ था, बचपन में ही उन्हे नृत्य और अभिनय में रूचि हो गई थी, अपनी ६ वर्ष की आयु में उन्होंने बंबई रेडियो स्टेशन से बाल सभा कार्यक्रम में गीत गाकर अपने सितारा भविष्य की पहचान करा दी थी , १० वर्ष की आयु में स्कूली कार्यक्रमों में अभिनय करके लोकप्रियता प्राप्त कर ली थी , आगे चलकर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर लिखित नाटक " श्रीमती जी " के नाट्य प्रयोग में अभिनय करके रंगमंच पर अभिनय की शुरुआत की , इसके बाद रंगमंच पर कई नाटको में अपने जीवित अभिनय से दर्शकों की प्रशंसा प्राप्त की , इसी के साथ फिल्मों के लिए उनकी राह आसान हो गई और वो रंगमंच से फिल्मों में आए _ पृथ्वीराज कपूर, दुर्गा खोटे , वनमाला , स्नेहलता प्रधान जैसे कलाकारों में शामिल हो गई
जब वो १३ वर्ष की थी उन्हे फिल्म में अभिनय करने का अवसर दिया निर्देशक वीरेंद्र देसाई ने फिल्म थी " राधिका " , इस फिल्म में नाजुकसी और मासूमसी निलिनी ने दर्शको का मन मोह लिया, इसके बाद मेहबूब खान की " सिस्टर" और वीरेंद्र देसाई की " निर्दोष " तथा आर एस चौधरी की " आंख मिचौली" फिल्मे आई , आंख मिचौली और आदाब अर्ज फिल्मों ने उनके अभिनय को देखते हुए वो स्टार अभिनेत्री बन गई
लगातार साथ में काम करते हुए आकर्षण में पड़ कर नलिनी ने निर्देशक वीरेंद्र देसाई से सन १९४३ में जबकि वो १७ वर्ष की थी विवाह कर लिया,जो उनके लिए घातक सिद्ध हुआ, अब उन्हे फिल्मे मिलना बंद हो गई, वैवाहिक जीवन भी असफल रहा , चार वर्षो में ही तलाक की नौबत आ गई
उनकी फिल्मों में पुनः वापसी हुई गुजराती फिल्म " वारसदार" से , उनके शुद्ध गुजराती भाषा के उच्चारण और शानदार अभिनय से एक बार फिर से लोकप्रियता प्राप्त कर ली, इस बार उनकी हिंदी फिल्म में वापसी हुई फिल्म " अनोखा प्यार" से , इसके बाद इनकी अभिनय यात्रा चल पड़ीं, उनकी कुछ फिल्मे हैं _ आंखे, नौजवान, समाधि , संग्राम , काफला , चंचल , शोले , नौबहार
,सलोनी, दो राहा , नंद किशोर , दुर्गेश नंदिनी ,जादू, जीत, एक नजर, राही, नास्तिक , मुनिमजी , हम सब चोर हैं, काला पानी , चकोरी ,मुक्ति आदि
अपनी बढ़ती आयु में उन्हे ९० के दशक में चरित्र भूमिकाएं मिलने लगी इस बार पहली फिल्म थी नास्तिक इस फिल्म में वो अमिताभ बच्चन की मां के रूप में नजर आई थी
सन २०११ में नलिनी जयवंत का स्वर्गवास हो गया, उन्हे विनम्र श्रद्धांजलि, प्रस्तुत है उनके चित्र मेरे संग्रह से
दिनांक १८ फरवरी २०२६

मित्रो आज  फिल्म संगीत के शुरुआती दौर के  एक महत्वपूर्ण स्तंभ  याने गायक तथा भारतीय फिल्मों में पार्श्व गायन की शुरुआत क...
20/02/2026

मित्रो
आज फिल्म संगीत के शुरुआती दौर के एक महत्वपूर्ण स्तंभ याने गायक तथा भारतीय फिल्मों में पार्श्व गायन की शुरुआत करने वाले संगीतकार पंकज मलिक की पुण्यतिथि है ,आइए उनके विषय में कुछ जानते है
आपका जन्म सन १९०४ में कलकत्ता में हुआ था
आप बहुत ही प्रतिभाशाली संगीतकार थे, आपने बंगाली , रविंद्र संगीत को मूर्त रूप देने के लिए , नया प्रयोग किया था जिसमे इसके साथ लोक संगीत , शास्त्रीय संगीत, पश्चिम देशों का संगीत का समावेश करके इस संगीत को बंगाल के बाहर लाकर पूरे देश में लोकप्रिय बना दिया था
आप कलकत्ता के न्यू थियेटर कामनी से जुड़े हुए थे, इसी कंपनी की फिल्म " मुक्ति " के लिए उन्होंने रविंद्र संगीत का जिस कुशलता से उपयोग और प्रयोग किया था इसका दूसरा उदाहरण मौजूद नहीं है
कविवर रविंद्र जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त व्यक्ति जिस समय अपनी लिखी कहानी पर बनने वाली फिल्म में ही अपने लिखे गीतो का उपयोग करते थे , ऐसे समय में गुरुवर रविंद्रनाथ टैगोर ने अपने लिखे गीतो को पंकज मालिक जी को संगीत में उपयोग करने की अनुमति दी थी , ये ऐसी फिल्मे थी जिसकी कहानी गुरुदेव ने नही लिखी थीं , उस समय ये एक असाधारण घटना थीं , जिसका मुख्य कारण था पंकज मलिक की संगीत प्रतिभा , उनका स्वभाव , उनका व्यक्तित्व था , उस समय उन्हे देखकर कहा जा सकता था की वो एक बिना भगवा वस्त्र धारण किए हुए एक साधु पुरुष है
अपने केरियर में सफलता के बाद कई फिल्म कांपनियो ने उन्हे मुंह मांगे दाम पर अपने यहां काम करने का प्रस्ताव दिया लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नही किया क्योंकि वो जिसे अपनी स्वयं की कंपनी समझते थे याने " न्यू थियेटर" उसे छोड़कर जाना उन्होंने स्वीकार नही किया
सन १९२६ में कलकत्ता में रेडियो केंद्र शुरू होने से लेकर सन १९७५ तक वो इस केंद्र से जुड़े रहकर इसके लिए काम करते रहे , प्रत्येक रविवार की सुबह रेडियो सुनने वालों को संगीत का पाठ पढ़ाते थे उस समय कई संगीत प्रेमियों ने इस माध्यम से पंकज मालिक जी से संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया था
वो बहुत अच्छे गायक थे वो चाहते तो अपनी संगीत निर्देशन वाली हर फिल्मों में सभी गीत स्वयं ही गा सकते थे , परंतु उन्होंने अपनी समझ अनुसार कई गीत उस समय के दिग्गज गायक सहगल साहब से गवाए थे
पंकज मलिक साहब ने संगीत के विषय में चार पुस्तके लिखी है
वो चार दशकों तक फिल्म संगीत में सक्रिय रहे, उनके कुछ गीत आज भी सुने जाते है जैसे _ आई बहार आई ( डॉक्टर ), ये कौन आज आया सवेरे सवेरे ( नर्तकी ), चले पवन की चाल ( डॉक्टर ), कौन देश है जाना बाबुल ( मुक्ति ), छुपो ना छूपो ना ( माय सिस्टर ), आदि
आपको भारत सरकार द्वारा सन १९७० में पद्मश्री तथा सन १९७३ में दादा साहेब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया है
सन १९७८ में उनका स्वर्गवास हो गया, उन्हे विनम्र श्रद्धांजलि , प्रस्तुत है उनका चित्र मेरे संग्रह से
दिनांक १९ फरवरी २०२६

मित्रो , आज एक ऐसे अभिनेता का जन्म दिवस है जो बहुत आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक होकर जिसने पिछली सदी के ४०/ ५० के दशक में ...
20/02/2026

मित्रो ,
आज एक ऐसे अभिनेता का जन्म दिवस है जो बहुत आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक होकर जिसने पिछली सदी के ४०/ ५० के दशक में कई सफल फिल्मे दी थी और केवल ३१ वर्ष की आयु में उसका स्वर्गवास हो गया था , ये है " श्याम "
आपका जन्म सन १९२० में अविभाजित भारत के सियालकोट में हुआ था आपका पूरा नाम था सुंदर श्याम चढ्ढा, उनके पिता सीताराम चड्ढा लाहौर फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए थे, इस कारण श्याम की फिल्मों में रुचि हो गई थी , उन्होंने रावल पिंडी के गार्डन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कई कार्यक्रमों में अभिनय किया , वो " वो दी नाटक सोसायटी ऑफ़ गार्डन कॉलेज " के प्रेसिडेंट थे , इसी कॉलेज से उन्होंने डिग्री प्राप्त की थी ,फिल्मों में अभिनय करने की इच्छा उन्हे मुम्बई ले आई बॉम्बे टॉकीज कंपनी में उनका ऑडिशन हुआ , अभिनेता के रूप में चयन तो नहीं हुआ लेकिन फिल्मकार जे पी नंदा ने उन्हे अपना सहायक बना लिया , कुछ दिन मुंबई में गुजारने के बाद वो वापस लाहौर लौट गए वहां उन्हें सन १९४२ में पहली फिल्म मिली पंजाबी भाषा की _ गवंडी जिसमे उस समय की प्रसिद्ध अभिनेत्री वीणा और मनोरमा ने उनके साथ काम किया था, फिल्म की सफलता के बाद सन १९४४ में _ मन की जीत फिल्म में अभिनय करके श्याम उभरते हुए सितारे बनते हुए स्टार बन गए
लाहौर में उनका केरियर बढ़िया चल रहा था कि देश के विभाजन की हलचल शुरू हो गई, श्याम मुंबई आ गये, फिर से बॉम्बे टॉकिज कंपनी पहुंचे इस बार उन्हें फिल्म " मजबूर " में नायक की भूमिका मिल गई सन १९४७ में रिलीज हुई इस फिल्म की नायिका थी " मुन्नवर सुलताना" फिल्म में उनका अभिनय देख कर फिल्मी पत्रिकाओं ने उन्हे आने वाले समय का बहुत बड़ा स्टार घोषित करते हुए उन्हें उस समय के सुपर स्टार पृथ्वीराज कपूर , मोतीलाल , अशोक कुमार के बराबरी का दर्जा दे दिया , सन १९४८ के बाद आई उनकी हर फिल्म सफल रही ये थी _ नाच , पतंगा, बाज़ार, दिल्लगी
उनका केरियर बढ़िया चल रहा था सन १९५१ में वो
नसीम बानो ( सायरा बानो की मां ) के साथ फिल्म " शबीस्तान " में काम कर रहे थे, फिल्म लगभग पूरी हो चुकी थी , दिनांक २५ अप्रैल १९५१ के दिन फिल्म के क्लायमेक्स की शूटिंग में घुड़सवारी के दृश्य फिल्माए जा रहे थे इस दौरान घोड़े पर सवार श्याम अचानक घोड़े से नीचे गिर गए, पीछे आने वाले घोड़ों के पैरो ने इन्हें बुरी तरह कुचल दिया और वहीं उनकी मौत हो गई , वो अच्छे गायक भी उनकी गायकी और उनको
देखने _ पहचानने के लिए फिल्म दिल्लगी का गीत " तू मेरा चांद तू मेरी चांदनी " देखना चाहिए
श्याम को विनम्र श्रद्धांजलि,
_ दिनांक २० फरवरी २०२६

मित्रो आज भारतीय फिल्म और  टेलीविजन के जानें माने अभिनेता विजय अरोड़ा की पुण्यतिथि है, आइए उनके विषय में कुछ जानते है आप...
05/02/2026

मित्रो
आज
भारतीय फिल्म और टेलीविजन के जानें माने अभिनेता विजय अरोड़ा की पुण्यतिथि है, आइए उनके विषय में कुछ जानते है
आपका जन्म सन १९४४ में पंजाब प्रांत के अमृतसर में हुआ था , अभिनय में रूचि होने के कारण अपनी पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने " फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया पुणे" में अभिनय के कोर्स के लिए दाखिला लिया, सन १९७१ में गोल्ड मेडल के साथ अभिनय का कोर्स पूरा किया और उन्हे फिल्मों के प्रस्ताव मिलने लगे, उन्हे उस समय की बड़ी अभिनेत्रियों के साथ नायक की भूमिका मिलने लगी इनमे _ जया भादुड़ी , आशा पारेख, रीना रॉय, जीनत अमान, शबाना आज़मी शामिल है , इनके साथ उनकी फिल्मे रही _ जरूरत , राखी और हथकड़ी , फागुन , जीवन ज्योति , दुर्भाग्य से ये सभी फिल्मे असफल रही , इसीके साथ विजय अरोड़ा को काम मिलना कम हो गया, ऐसे में उन्होंने सहायक भूमिका निभाना शुरू किया, ऐसी ही फिल्म थी " यादों की बारात" सन १९७३ की इस फिल्म में उन्होंने " धर्मेंद्र साहब " के छोटे भाई की भूमिका निभाई थी फिल्म की जबरजस्त सफलता के बाद भी उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं मिला, तब उन्होंने छोटे बजट की फिल्मों में अभिनय करना शुरू किया इनमे अधिकांश डाकुओ या डरावनी कहानियों वाली फिल्मे थी इनमे _ आखरी चीख , विराना, डाकु हसीना , जैसी फिल्मे थी
सन १९८५ में फिल्मकार ' रामानंद सागर साहब " ने अपने टी वी धारावाहिक" विक्रम बेताल " में विजय अरोड़ा को १०_ १२ एपिसोड में अलग अलग भूमिकाओ में पेश किया , इस काम में उनके अभिनय की प्रशंसा हुई, आगे रामानंद सागर साहब ने विजय अरोड़ा को अपनी कालजई और महान टी वी धारावाहिक " रामायण " में लंकापति रावण के पुत्र " मेघनाद " याने " इंद्रजीत " की भूमिका दी , इस भूमिका में उन्होंने जबरजस्त अभिनय करके लोकप्रियता प्राप्त की , इस के बाद कई टी वी धारावाहिक में छोटी मोटी भूमिकाएं निभाते रहे, साथ ही फिल्मों में भी अभिनय करते रहे , इसी दौरान रंगमंच पर उन्होंने कुछ नाटको में भी अभिनय किया, इसी के साथ उन्होंने कंप्यूटर सॉफ्टवेयर का कारोबार शुरू किया इसमें अच्छी सफलता प्राप्त की
उन्होंने एक मुस्लिम लड़की से शादी की थी जो मॉडलिंग का काम करती थी, उनका एक बेटा है जो मोटर कार के कारोबार में है ,उनके जीवन में सब कुछ बढ़िया चल रहा था कि उन्हे पेट में कैंसर का रोग हो गया इसी कारण सन २००७ में उनका निधन हो गया, उन्हे विनम्र श्रद्धांजलि
आपकी कुछ फिल्मे हैं _ अनुराग, सबसे बड़ा सुख , मेरे भैया, इंसाफ, एक मुठ्ठी आसमान, रोटी,३६ घंटे , नाटक, कादंबरी, दुनियादारी, आनंद महल, दिल और दीवार , घर की लाज , सरगम , बेकसूर, दम मारो दम, जमाने को दिखाना है, दूल्हा बिकता है, सौतन , बड़े दिल वाला, यादगार, आज की आवाज , साहेब , आदि
_ दिनांक २ फरवरी २०२६

मित्रो, आज सुनहरे युग की सफलतम _ लोकप्रिय अभिनेत्री वहीदा रहमान जी का जन्म दिवस हैं, आपका जन्म सन १९३८ में ब्रिटिश शासन ...
05/02/2026

मित्रो,
आज सुनहरे युग की सफलतम _ लोकप्रिय अभिनेत्री वहीदा रहमान जी का जन्म दिवस हैं, आपका जन्म सन १९३८ में ब्रिटिश शासन के मद्रास प्रेंसीडेंसी के चेंगल पट्टू में हुआ है , आपके पिताजी वहां कलेक्टर के पद पर नौकरी में थे, वहीदा जी को बचपन से शास्त्रीय नृत्य का शौक था उन्होंने अपनी बहन के साथ भरत नाट्यम का प्रशिक्षण प्राप्त किया, इसके बाद दोनो बहने रंगमंच पर अपने नृत्य के प्रोग्राम करने लगी , उन्होंने हमारे देश के प्रथम वाइसराय के सामने भी अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन किया है , ऐसे ही एक प्रोग्राम में उनका नृत्य देखकर फिल्मकार गुरुदत्त साहब बहुत प्रभावित हुए, और उन्हे अपनी फिल्म में काम करने का प्रस्ताव दिया, हालांकि इसके पहले वहीदा जी सन १९५५ में एक तेलुगु फिल्म में छोटी सी भूमिका निभा चुकी थी, गुरुदत्त साहब द्वारा निर्मित " सी आई डी" फिल्म में पहली बार वहीदा जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, याद कीजिए गीत " कहीं पे निगाहे कहीं पे निशाना " देवानंद साहब नायक थे फिल्म की जबरजस्त सफलता के साथ वहीदा जी स्टार बन गई, इसके बाद उन्होंने गुरुदत्त साहब की _ प्यासा , कागज के फूल, साहब बीबी और गुलाम तथा चौदहवीं का चांद में मुख्य भूमिका निभाई , लगातार साथ काम करने के कारण गुरुदत्त साहब वहीदा जी के प्रति आकर्षित हो हो गए थे, इस बात को लेकर उनके और उनकी गायिका पत्नी गीतादत्त से विवाद होने लगे , दोनो में मनमुटाव हो गया, गुरुदत्त साहब मानसिक रूप से परेशान रहने लगे थे ऐसे में सन १९६४ में उनका असामयिक स्वर्गवास हो गया
सन १९६४ में वहीदा जी ने अपनी फिल्म" शगुन " के नायक कंवलजीत के साथ शादी कर ली
देव आनंद साहब के साथ वहीदा जी की हर फिल्म कामयाब रही , देव साहब की ही गाइड फिल्म के वहीदा के नृत्य गीतो को साठ वर्ष बीतने के बाद आज भी खूब याद किया जाता हैं, पसंद किया जाता है
अपनी बढ़ती आयु में उन्होंने चरित्र भूमिकाएं निभाना शुरू कर दिया , इस दूसरे दौर में कुछ फिल्मे करने के बाद १०_ १२ वर्ष फिल्मों से दूर रही , लेकिन उनकी फिर से वापसी हुई और उन्होंने _ ओम जय जगदीश, रंग दे बसन्ती, दिल्ली ६ फिल्मों में काम किया
सन १९७२ में भारत सरकार द्वारा उन्हे पद्मश्री , २०११ में पद्म भूषण से अलंकृत किया गया है, फिल्म रेशमा और शेरा के लिए उन्हे राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुका है
आपने तमिल, तेलुगु , मलयालम और बंगला फिल्मों में भी अभिनय किया है, आपके अभिनय से सजी कुछ फिल्मे _ काला बाजार, बीस साल बाद, मुझे जीने दो, कोहरा, सोलवा साल , बात एक रात की , तीसरी कसम, एक फूल चार कांटे , एक दिल सौ अफसाने , रूप की रानी चोरों का राजा, राखी , गर्ल फ्रेंड, खामोशी , पालकी, राम और श्याम, आदमी , खामोशी, नील कमल, पत्थर के सनम, धरती, शतरंज, मेरी भाभी, बाजी ( धर्मेंद्र ) , प्रेम पुजारी अदालत, कभी कभी, फागुन , कुली आदि
आपको सन २९६७ में फिल्म गाइड के लिए , सन १९६९ में नील कमल के लिए फिल्म फेयर का श्रेष्ठ अभिनेत्री तथा सन १९७२ में रेशमा और शेरा के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है
भारत सरकार द्वारा उन्हें सन २०२३ में दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया है
वहीदा रहमान जी को जन्म दिवस की शुभकामनाएं , प्रस्तुत है उनका चित्र मेरे संग्रह से
३ फरवरी २०२६

मित्रो , आज विश्व प्रसिद्ध पेपर प्रिंट  मैगजीन " रीडर्स डायजेस्ट" का प्रकाशन दिवस है सन १९२२ अर्थात आज से ठीक १०५  वर्ष ...
05/02/2026

मित्रो ,
आज विश्व प्रसिद्ध पेपर प्रिंट मैगजीन " रीडर्स डायजेस्ट" का प्रकाशन दिवस है
सन १९२२ अर्थात आज से ठीक १०५ वर्ष पूर्व इस पत्रिका का प्रथम संस्करण का प्रकाशन हुआ था
पत्रकार " डेविस वालेस " ने इस पत्रिका की शुरुआत की थी , शुरुआत होते ही इस पत्रिका की लोकप्रियता बढ़ती चली गई , जो बहुत जल्दी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक जा पहुंची
सन १९४८ में दुनिया भर के ७० से अधिक देशों में ४९ संस्करणों में इसका प्रकाशन होना शुरू हो चुका था, जो विश्व की २१ भाषाओं में छपता था ,
जिन्हें आंखों से कम दिखाई देता है उनके लिए ब्रेल लिपि में , अति व्यस्तता वाले लोगों के लिए पॉकेट साइज इस तरह इस पत्रिका के प्रकाशकों ने हर तरह के पाठकों का ध्यान रखते हुए अपना प्रकाशन जारी रखा
इस पत्रिका में दुनिया के हर तरह के पढ़ाकू इंसान के दिलचस्पी की सामग्री होती थी , जैसे कि साहित्य , इतिहास , विज्ञान , हास्य, फिल्म , वर्तमान में चल रही गति विधि , स्पोर्ट्स आदि
हमारे देश में पिछले सदी के ९ वे दशक में इस पत्रिका का हिंदी संस्करण " सर्वोत्तम " के नाम से प्रकाशित किया गया, जो बहुत जल्द लोकप्रिय हो गया , ये पत्रिका किसी किताब की दुकान में नहीं मिलती थी , इसे इसके प्रकाशकों से एक वर्ष की एडवांस कीमत चुकाकर पोस्ट के द्वारा मंगवाया जाता था
मुझ जैसे पढ़ने के शौकीन व्यक्तियो ने सहर्ष इस व्यवस्था में शामिल हो कर इस पत्रिका के पढ़ने का आनंद लिया है
धीरे धीरे पूरे विश्व में " रीडर्स डाइजेस्ट " के पढ़ने वालों की संख्या करोड़ों तक पहुंच चुकी थी जो नियमित रूप से इस मासिक पत्रिका को पढ़ते थे
रीडर्स डाइजेस्ट पत्रिका को अपने प्रकाशन दिवस की बहुत बहुत बधाई
स्वयं मेरे संग्रह में इस पत्रिका के हिन्दी संस्करण " सर्वोत्तम " की लगभग १०० प्रतियां सुरक्षित मौजूद है , जिन्हें कभी रद्दी में बेचने का मन नहीं करता है , क्योंकि वो अब नायाब हो चुकी हैं , इस मैगजीन का प्रकाशन अब बंद हो गया है

मित्रो , आज हमारे देश के महान शास्त्रीय संगीत के गायक " भारत रत्न " से पुरस्कृत " पंडित भीमसेन जोशी ' साहब का जन्म दिवस ...
05/02/2026

मित्रो ,
आज हमारे देश के महान शास्त्रीय संगीत के गायक
" भारत रत्न " से पुरस्कृत " पंडित भीमसेन जोशी ' साहब का जन्म दिवस है
आपका जन्म सन १९२२ में कर्नाटक राज्य के धारवाड़ जिले के गांव _ ग़ड़क में हुआ था
आपको बचपन से ही गीत _ संगीत से लगाव हो गया था क्योंकि उनके परिवार का माहौल ही संगीत से भरपुरा था , उनके दादाजी " पंडित भीमाचार्य " कीर्तनकार , प्रवचन कर्ता और स्वर साधक थे
पिताजी " गुरुदास जोशी " संस्कृत के विद्वान होकर स्कूल के प्रधानाचार्य थे , माताजी " गोदावरी बाई " कन्नड़ भाषा की भजन गायिका थी
उनके काका " जड़ भरत " के नाम से लेखन कार्य करते थे और नाटककार थे
पंडित भीमसेन जोशी जी के गुरु रहे कर्नाटक के प्रसिद्ध संत पुरुष " शिव वासव स्वामी " , सिद्धरूप स्वामी और मृत्युंजय स्वामी
आपके गुरु ने सबसे पहले आपको " राम भद्राय " सिखाया, १० वर्ष की आयु में उन्हे हारमोनियम बजाने का प्रशिक्षण दिलाया गया , इन सभी शिक्षा के बाद भी पंडित जी को मन की संतुष्टि नहीं मिल रही थी तो वो घर से पलायन करके बंबई चले आए, उन्हे उनके मन के अनुरूप संगीत गुरु की खोज थी जो पूरी नहीं हो पा रही थी, बंबई से भटकते हुए ग्वालियर होते हुए पुनः घर पहुंचे लेकिन मन नहीं लगा तो पुनः अपने मन के लायक गुरु की खोज में जालंधर पहुंच गए जहां उनकी भेंट " पंडित विनायकराव पटवर्धन" से हुई जिनसे भीमसेन जी ने अपने मन की व्यथा कह सुनाई पर बात नहीं बन पाई
उनके भाग्य और संयोग से सन १९३९ में उनकी भेंट कर्नाटक के हुबली रेलवे स्टेशन पर " सवाई गंधर्व " से हुई उन्होंने भीमसेन जी को अपना शिष्य बनाकर उन्हें अगले पांच वर्षों तक शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण दिया , इसके बाद अपने गुरु के साथ गायन शुरू किया इसके साथ ही दिनों दिन उनके गायन में निखार आता चला गया
पंडित भीमसेन जी प्रसिद्ध गायक " अब्दुल करीम खां साहब " के गायन से बहुत प्रभावित रहे इसलिए उन्होंने अपने गायन की शैली में खां साहब के गायन और अपने गुरु सवाई गंधर्व के राग विस्तार के मिश्रण की एक नई गायन शैली विकसित की थी
आपको भारत सरकार ने सन १९७२ में पद्मश्री और आगे चलकर भारत रत्न से पुरस्कृत किया है
आपने शास्त्रीय संगीत गायन के साथ साथ भजन गायन करते हुए जबरजस्त लोकप्रियता प्राप्त की है
आपने कुछ फिल्मों गीत भी गाए है इनमें फिल्म
_ बसंत बहार , अनकही और बंगला फिल्म " तानसेन " प्रमुख है , तानसेन फिल्म के गीत के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुका है
उनके गायन से प्रभावित होकर अफगानिस्तान की राजकुमारी ने उन्हे काबूल में गायन के लिए आमंत्रित किया था जहां एक भव्य और शानदार संगीत का कार्यक्रम आयोजित किया गया था
सन २०११ में आपका स्वर्गवास हो गया उन्हे विनम्र श्रद्धांजलि, प्रस्तुत है उनका चित्र मेरे संग्रह से
४ फरवरी २०२६

मित्रो , आज अभिनेता सज्जन का जन्म दिवस हैआपका जन्म सन १९२१ में जयपुर में हुआ था, पूरा नाम था " सज्जनलाल पुरोहित " आपको ब...
28/01/2026

मित्रो , आज अभिनेता सज्जन का जन्म दिवस है
आपका जन्म सन १९२१ में जयपुर में हुआ था, पूरा नाम था " सज्जनलाल पुरोहित " आपको बचपन से ही अभिनय में रूचि रही , आप बहुत प्रखर बुद्धि के व्यक्ति थे , जोधपुर के जसवंत कॉलेज से वकालत की डिग्री लेने के बाद पेशेवर वकील का काम करने के उद्देश्य से कलकत्ता पहुंचे यहां वकालत और अभिनय दोनो करना चाहा पर हो नही पाया , वहीं एक इंश्युरेंस कंपनी में नौकरी कर ली , परंतु अभिनेता बनने का जुनून दिलो दिमाग में छाया हुआ था, भाग्य से उनकी मुलाकात फिल्मकार हुसैन पाली से हो गई उन्होंने सज्जन को सन १९४१ की फिल्म" मासूम "में छोटी सी भूमिका दी , इसके बाद उनका फिल्मों के प्रति आकर्षण और बढ़ गया अपनी जमा पूंजी लेकर मुंबई आ गए साल था १९४२ , अगले साल उन्हे फिल्म " फैशन " में काम मिला , लेकिन इसके बाद काम की तलाश में धक्के खाते रहे पर काम नही मिला ऐसे में उनकी मुलाकात " पृथ्वीराज कपूर साहब" से हो गई, पापा जी ने सलाह दी किसी निर्देशक के सहायक बन जाओ और सज्जन को केदार शर्मा के पास सहायक का काम दिला दिया वेतन बहुत कम था वेतन बढ़ाने की बात पर केदार शर्मा जी ने उन्हे टेलीफोन ऑपरेटर का काम करने की सलाह दी , अब सज्जन ने फैसला किया की वो पृथ्वी थिएटर में ही काम करेंगे , यहां नए कलाकारों को पैसे नही दिए जाते थे, फिर भी सज्जन ने पृथ्वी थिएटर के कई नाटकों में अभिनय किया, उनका अभिनय देखकर व्ही शांताराम साहब ने उन्हे "अपना देश "फिल्म में अभिनय करने का प्रस्ताव दिया, शर्त ये थी की उन्हे पृथ्वी थिएटर छोड़ना पड़ेगा , सज्जन ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया उन्हे किसी भी कीमत पर पृथ्वी थिएटर छोड़ना मंजूर नहीं था उनकी ये बात उनके साथ के कई वरिष्ठ फिल्मी लोगो को बहुत अच्छी लगी और अब उन्हे नायक और अन्य भूमिकाएं मिलने लगीं , सन १९५० की दो फिल्में बहुत मजेदार रही
" मुकद्दर " में वो नलिनी जयवंत के हीरो थे तो फिल्म " संग्राम " में उन्हे नलिनी जयवंत के पिता की भूमिका करनी पड़ी आपने लगभग १५० फिल्मों में विभिन्न भूमिकाएं निभाई है
सन १९८५ के टी वी धारावाहिक " विक्रम बेताल " में उनकी बेताल की भूमिका बहुत लोकप्रिय रही है
आपकी कुछ फिल्मे है _ हम लोग, पूनम , मालकिन , हल्ला गुल्ला , दो दूल्हे , लगान , घर घर में दिवाली , ढाके की मलमल, पेइंग गेस्ट, तलाक , चलती का नाम गाड़ी , बारात, सरहद , बरखा , काबूली वाला, झुमरू, इशारा, अप्रेल फूल, दिल दिया दर्द लिया, राम और श्याम, आशीर्वाद , फर्ज आदि
फिल्म , जानी मेरा नाम का गीत " बाबुल प्यारे " उन्हीं के लिए उनकी बेटी की भूमिका कर रही हेमा मालिनी पर फिल्माया गया है सन २००० में उनका स्वर्गवास हो गया
दिनांक १५ जनवरी २०२६

मित्रो , "हरे राम हरे कृष्ण " मिशन से जुड़ा होमियो पैथी का डॉक्टर जो सुनहरे युग का लोकप्रिय और सफल संगीत निर्देशक बन गया...
28/01/2026

मित्रो ,
"हरे राम हरे कृष्ण " मिशन से जुड़ा होमियो पैथी का डॉक्टर जो सुनहरे युग का लोकप्रिय और सफल संगीत निर्देशक बन गया , याने " ओ पी नय्यर " का आज
जन्म दिवस है
आपका जन्म सन १९२६ में पटियाला में हुआ था, आवश्यक पढ़ाई के बाद उन्हे आकाशवाणी के जालंधर केंद्र में नौकरी मिल गई , गीत संगीत में गहरी रुचि होने से नौकरी छोड़ कर मुंबई आ गए , कुछ दिन संघर्ष के बाद फिल्मकार दलसुख पंचोली की फिल्म " आसमान " में संगीत निर्देशन का पहला अवसर मिला , उल्लेखनीय है की इस फिल्म के एक गीत के प्रारंभिक संगीत " को बिनाका गीत माला " की पहचान धुन में उपयोग किया जाता था, उन्हे शुरुआती फिल्मे _ बाज , छमाछम में मामूली पहचान मिली , लेकिन गुरुदत्त साहब की " आर पार " के गीत संगीत ने धूम मचा दी और
ओ पी नय्यर साहब स्टार संगीत निर्देशक बन गए , गुरुदत्त साहब की फिल्मे _ मिस्टर एंड मिसेज ५५, सी आई डी, बहारे फिर भी आयेंगी में लोकप्रिय संगीत दिया
आपने अपने संगीत में पंजाबी लोक संगीत के साथ विदेशी संगीत का भरपूर उपयोग किया है, इस दौर की फिल्मों में क्लब डांस का बहुत चलन था जिसमे कुक्कू , हेलेन के डांस गीत होते थे, ऐसे गीतो में नय्यर साहब को महारथ हासिल थी, उन्होंने अपने गीतो की रिदम में घोड़े की टाप की आवाज का भी खूब उपयोग किया, उनके दौर के अन्य स्टार संगीत निर्देशक _ शंकर जयकिशन , एस डी बर्मन, नौशाद , रोशन , रवि ,मदन मोहन के होते हुए, ओ पी नय्यर साहब ने अपनी एक अलग पहचान बनाई
उस जमाने में लता मंगेशकर जी के बगैर फिल्म संगीत की कल्पना नहीं की जा सकती थी, लेकिन ओ पी नय्यर साहब ने अपने पूरे केरियर में लता जी से एक भी गीत नहीं गवाया , इसका कारण रहा ओ पी साहब की पहली फिल्म " आसमान " के लिए एक गीत की रिकार्डिंग के समय लताजी निर्धारित समय पर नहीं पहुंच पाई , क्योंकि उनकी नाक में कुछ तकलीफ थी , वहीं दूसरी ओर ओ पी साहब समय के बहुत पाबंद थे , यहीं से दोनों के बीच गलत फहमी पैदा हो गई थी , अब ओ पी साहब ने शमशाद बेगम को अवसर दिया , बाद में गीतादत्त को भी बहुत मौके दिए इसके बाद , फिल्म नया दौर से आशा भोसले को अपने संगीत में गाने का अवसर दिया और यहीं से आशा जी को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंची, उन्हे शिखर पर पहुंचाने में ओ पी साहब के संगीत का बहुत बड़ा योगदान रहा है
ओ पी नय्यर साहब के संगीत से सजी कुछ फिल्मे हैं _ नया दौर, फागुन, सोने की चिड़िया , छू मंतर , एक मुसाफिर एक हसीना, नया अंदाज, तुमसा नहीं देखा, दो उस्ताद , बाप रे बाप, कल्पना , रागिनी, फिर वही दिल लाया हूं, सावन की घटा, कश्मीर की कली, किस्मत , कही दिन कही रात , एक बार मुस्कुरा दो , संबंध, नसीहत , आदि
सन २००७ में उनका स्वर्गवास हो गया उन्हे विनम्र श्रद्धांजलि,
_ दिनांक १६ जनवरी २०२५

मित्रो , आज लेखक , निर्माता , निर्देशक _कमाल अमरोही का जन्म दिवस है, आपका जन्म सन १९१८  में उत्तर प्रदेश के अमरोहा में ह...
28/01/2026

मित्रो , आज
लेखक , निर्माता , निर्देशक _कमाल अमरोही का जन्म दिवस है, आपका जन्म सन १९१८ में उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ था , आपका मूल नाम था सैयद अमीर हैदर कमाल , वो अभी १६ वर्ष के थे की घर से भागकर लाहौर पहुंच गए जो उस समय हमारे देश का हिस्सा होकर फिल्मों का बड़ा केंद्र था , वहां भटकते हुए उन्हे एक दयावान व्यक्ति ने अपनी शरण में लिया और उन्हे पढ़ाया लिखाया , कमाल बहुत तेज दिमाग वाले व्यक्ति थे उन्हे कहानियां पढ़ने और लिखने का शौक था , अपनी पढ़ाई के समय वो तत्कालीन पंजाब यूनिवर्सिटी के टॉप स्टूडेंट रहे है , लिखने की प्रतिभा के कारण उनकी लिखी कुछ कहानियां समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई , इसी कारण उनकी भेंट महान अभिनेता _ गायक के एल सहगल साहब से हो गई , सहगल साहब ने उन्हे मुंबई में सोहराब मोदी से मिलवाया , मोदी जी ने कमाल साहब की लिखी पटकथा पर फिल्म " पुकार " बनाई ,इसके बाद कमाल अमरोही ने मोदी जी की जेलर , भरोसा तथा फिल्मकार _ ए आर कारदार की सन १९४६ की फिल्म " शाहजहां " की पटकथा लिखी ये सभी फिल्मे सफल रही
सन १९४९ में अपनी लिखी पटकथा पर अशोक कुमार और मधुबाला को लेकर फिल्म " महल " का निर्माण और निर्देशन किया फिल्म जबरजस्त सफल रही, फिल्म का लता मंगेशकर जी का गाया गीत " आयेगा आएगा आने वाला आयेगा " जबरजस्त लोकप्रिय हुआ और आज भी लोकप्रिय बना हुआ है , लता जी को स्टार गायिका का दर्जा मिलने में इस फिल्म के गीतो का बड़ा योगदान रहा है
आगे फिल्म मुगले आजम के संवाद लेखन के लिए कमाल अमरोही को पुरस्कार प्राप्त हुआ
सुपर हिट फिल्म " दिल अपना प्रीत पराई " में उनके ही लिखे संवाद थे, पटकथा भी उन्हीं लिखी थी हुई थी
सन १९५८ में कमाल अमरोही ने अपनी कंपनी " महल पिक्चर्स " के लिए " कमाल स्टूडियो " की स्थापना की जिसका कारोबार सफल नही रहा और केवल तीन वर्षो बाद ये स्टूडियो " नटराज स्टूडियो " के नाम से परिवर्तित हो गया
उनकी लिखी पटकथा पर बनी एक फिल्म दायरा के निर्माण के दौरान फिल्म की नायिका मीना कुमारी और उनके बीच प्रेम संबंध हो गए , पहले से विवाहित कमाल अमरोही साहब से मीना कुमारी ने शादी कर ली जो सफल नहीं रही , इस असफल विवाह की वजह से ही मीना जी ने शराब पीना शुरू किया और धीरे धीरे बेतहाशा पीने से उनकी अल्पायु में मृत्यु हो गई
कमाल अमरोही ने केवल चार फिल्मों का निर्देशन किया , सन १९४९ _ महल / १९५३ _ दायरा / ७२ _ पाकिजा और सन १९८३ _ रजिया सुल्तान
कमाल अमरोही ने राजेश खन्ना और राखी को लेकर फिल्म " मजनून" बनाना शुरू किया था, जो उनके निधन के कारण अधूरी रह गई क्योंकि
सन १९९३ में उनका निधन हो गया ,उन्हे विनम्र श्रद्धांजलि,
_ दिनांक १७ जनवरी २०२६

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